आवाज Poetry (page 8)

तुझ को आते ही नहीं छुपने के अंदाज़ अभी

सूफ़ी तबस्सुम

इस आलम-ए-वीराँ में क्या अंजुमन-आराई

सूफ़ी तबस्सुम

लम्बी ख़ामोशी की साज़िश को हराए कोई

सुबोध लाल साक़ी

शौक़ रातों को है दरपय कि तपाँ हो जाऊँ

सिराजुद्दीन ज़फ़र

शौक़ रातों को है दर पे कि तपाँ हो जाऊँ

सिराजुद्दीन ज़फ़र

और खुल जा कि मआ'रिफ़ की गुज़रगाहों में

सिराजुद्दीन ज़फ़र

मुश्ताक़ हूँ तुझ लब की फ़साहत का व-लेकिन

सिराज औरंगाबादी

मिरा दिल आ गया झट-पट झपट में

सिराज औरंगाबादी

है जुम्बिश-ए-मिज़्गाँ में तिरी तीर की आवाज़

सिराज औरंगाबादी

फ़िदा कर जान अगर जानी यही है

सिराज औरंगाबादी

झुका के सर को चलना जिस जगह का क़ाएदा था

सिराज अजमली

महीने के अख़ीर दिनों में

सिदरा सहर इमरान

ज़र्द चेहरों से निकलती रौशनी अच्छी नहीं

सिब्त अली सबा

इक़बाल से हम-कलामी

शोरिश काश्मीरी

इस कशाकश में यहाँ उम्र-ए-रवाँ गुज़रे है

शोरिश काश्मीरी

जाने क्या बात है मानूस बहुत लगता है

शोहरत बुख़ारी

दरों को चुनता हूँ दीवार से निकलता हूँ

शोएब निज़ाम

चश्म-ए-गर्दूं फिर तमाज़त अपनी बरसाने लगी

शोएब निज़ाम

क़द्र की रात बड़ी प्यारी है

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

मोअज़्ज़िन मर्हबा बर-वक़्त बोला

ज़ौक़

बर्क़ मेरा आशियाँ कब का जला कर ले गई

ज़ौक़

कब चला जाता है 'शहपर' कोई आ के सामने

शहपर रसूल

कई शक्लों में ख़ुद को सोचता है

शीन काफ़ निज़ाम

छीन कर वो लज़्ज़त-ए-सौत-ओ-सदा ले जाएगा

शीन काफ़ निज़ाम

संग-आबाद की एक दुकाँ

शाज़ तमकनत

हम-ज़ाद

शाज़ तमकनत

बे-नंग-ओ-नाम

शाज़ तमकनत

आब ओ गिल

शाज़ तमकनत

ज़रा सी बात थी बात आ गई जुदाई तक

शाज़ तमकनत

जिस तरफ़ जाऊँ उधर आलम-ए-तन्हाई है

शाज़ तमकनत

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