बज़्म Poetry (page 32)

उस आँख न उस दिल से निकाले हुए हम हैं

अशफ़ाक़ हुसैन

किसी की चाह में ग़म क्या है और ख़ुशी क्या है

असग़र वेलोरी

किस तरह आए तिरी बज़्म-ए-तरब में आइना

असीर लखनवी

हुस्न-ए-बेपर्दा की गर्मी से कलेजा पक्का

असीर लखनवी

लुत्फ़ गुनाह में मिला और न मज़ा सवाब में

असर सहबाई

वो जो नहीं हैं बज़्म में बज़्म की शान भी नहीं

असर रामपुरी

न शरह-ए-शौक़ न तस्कीन जान-ए-ज़ार में है

असर लखनवी

भूले अफ़्साने वफ़ा के याद दिल्वाते हुए

असर लखनवी

जो बज़्म-ए-दहर में कल तक थे ख़ुद-सरों की तरह

असद जाफ़री

न बज़्म अपनी न अपना साक़ी न शीशा अपना न जाम अपना

असद भोपाली

अज़ल के दिन जिन्हें देखा था बज़्म-ए-हुस्न-ए-पिन्हाँ में

आरज़ू सहारनपुरी

अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ भी थी परवाना भी

आरज़ू लखनवी

मीर-ए-महफ़िल न हुए गर्मी-ए-महफ़िल तो हुए

आरज़ू लखनवी

दूर थे होश-ओ-हवास अपने से भी बेगाना था

आरज़ू लखनवी

अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ' भी थी परवाना भी

आरज़ू लखनवी

निगाह तेज़ शुऊ'र-ए-बुलंद रखते हैं

अर्शी भोपाली

परतव-ए-रुख़ का तिरे दिल में गुज़र रहता है

अरशद अली ख़ान क़लक़

नहीं चमके ये हँसने में तुम्हारे दाँत अंजुम से

अरशद अली ख़ान क़लक़

चश्मक-ज़नी में करती नहीं यार का लिहाज़

अरशद अली ख़ान क़लक़

बस एक ही कैफ़िय्यत-ए-दिल सुब्ह-ओ-मसा है

अर्श सिद्दीक़ी

आँखों में कहीं उस के भी तूफ़ाँ तो नहीं था

अर्श सिद्दीक़ी

सब देखने वाले उन्हें ग़श खाए हुए हैं

अर्श मलसियानी

छुपाए दिल में हम अक्सर तिरी तलब भी चले

आरिफ़ अब्दुल मतीन

सुकून-ए-दिल न मयस्सर हुआ ज़माने में

अनवापुल हसन अनवार

सारे कुश्तों से जुदा ढंग इज़्तिराब-ए-दिल का है

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

उस बज़्म में क्या कोई सुने राय हमारी

अनवर शऊर

मैं बज़्म-ए-तसव्वुर में उसे लाए हुए था

अनवर शऊर

निगाह-ओ-दिल से गुज़री दास्ताँ तक बात जा पहुँची

अनवर साबरी

उन से हम लौ लगाए बैठे हैं

अनवर देहलवी

न मैं समझा न आप आए कहीं से

अनवर देहलवी

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