चेहरा Poetry (page 8)

रूह से कब ये जिस्म जुदा है

शकील ग्वालिआरी

नुमायाँ दोनों जानिब शान-ए-फ़ितरत होती जाती है

शकील बदायुनी

चाँदनी में रुख़-ए-ज़ेबा नहीं देखा जाता

शकील बदायुनी

तुझ को सोचों तो तिरे जिस्म की ख़ुशबू आए

शकील आज़मी

राज़ में रख तिरी रुस्वाई का क़िस्सा मैं हूँ

शकील आज़मी

अकेले रहने की ख़ुद ही सज़ा क़ुबूल की है

शकील आज़मी

रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ

शकेब जलाली

क्या कहूँ दीदा-ए-तर ये तो मिरा चेहरा है

शकेब जलाली

कोई भूला हुआ चेहरा नज़र आए शायद

शकेब जलाली

काला पत्थर

शकेब जलाली

वही झुकी हुई बेलें वही दरीचा था

शकेब जलाली

मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में

शकेब जलाली

ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं

शकेब जलाली

आ के पत्थर तो मिरे सहन में दो चार गिरे

शकेब जलाली

साथ ग़ुर्बत में कोई ग़ैर न अपना निकला

शकेब बनारसी

कुछ भी हो तक़दीर का लिक्खा बदल

शाइस्ता सहर

पत्थर न फेंक देख ज़रा एहतियात कर

शहज़ाद अहमद

ख़ुद पर भी खोलिए न कभी दिल की वारदात

शहज़ाद अहमद

हम कि इंसान नहीं आँखें हैं

शहज़ाद अहमद

मैं कि ख़ुश होता था दरिया की रवानी देख कर

शहज़ाद अहमद

जिस ने तिरी आँखों में शरारत नहीं देखी

शहज़ाद अहमद

इस दौर-ए-बे-दिली में कोई बात कैसे हो

शहज़ाद अहमद

हाल उस का तिरे चेहरे पे लिखा लगता है

शहज़ाद अहमद

देख अब अपने हयूले को फ़ना होते हुए

शहज़ाद अहमद

देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है

शहरयार

तेरे वा'दे को कभी झूट नहीं समझूँगा

शहरयार

हवा चले वरक़-ए-आरज़ू पलट जाए

शहरयार

नींद की माती

शहनाज़ नबी

मौज आए कोई हल्क़ा-ए-गिर्दाब की सूरत

शाहिद शैदाई

बुझे बुझे से चराग़ों से सिलसिला पाया

शाहिद माहुली

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