दूर Poetry (page 24)

छुप-छुप के तू 'शाद' उस से मुलाक़ात करे है

शाद बिलगवी

सियाहकार सियह-रू ख़ता-शिआर आया

शाद अज़ीमाबादी

ये सिलसिले भी रिफ़ाक़त के कुछ अजीब से हैं

शबनम शकील

क़फ़स को ले के उड़ना पड़ रहा है

शबनम शकील

मजबूर हैं पर इतने तो मजबूर भी नहीं

शबनम शकील

हम-नशीनो कुछ नहीं रक्खा यहाँ पर कुछ नहीं

शबनम शकील

यही सुलूक मुनासिब है ख़ुश-गुमानों से

शबनम रूमानी

मेरे प्यार का क़िस्सा तो हर बस्ती में मशहूर है चाँद

शबनम रूमानी

मय-ए-फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था

शब्बीर शाहिद

जो ग़म-ए-हबीब से दूर थे वो ख़ुद अपनी आग में जल गए

शायर लखनवी

रू भी अक्स-ए-रू भी मैं

शानुल हक़ हक़्क़ी

नज़र चुरा गए इज़हार-ए-मुद्दआ से मिरे

शानुल हक़ हक़्क़ी

क़दम सँभल के बढ़ाओ कि रौशनी कम है

शाद आरफ़ी

जब तक हम हैं मुमकिन ही नहीं ना-महरम महरम हो जाएँ

शाद आरफ़ी

फ़रिश्ते भी पहुँच सकते नहीं वो है मकाँ अपना

सेहर इश्क़ाबादी

फिर आ गया ज़बाँ पे वही नाम क्या करें

सीमाब सुल्तानपुरी

आँगन से ही ख़ुशी के वो लम्हे पलट गए

सीमाब सुल्तानपुरी

गौतम-बुद्ध

सीमाब अकबराबादी

जिंदान-ए-काएनात में महसूर कर दिया

सीमाब अकबराबादी

ये दौर-ए-तरक़्क़ी है रिफ़अत का ज़माना है

सीमाब अकबराबादी

तक़दीर में इज़ाफ़ा-ए-सोज़-ए-वफ़ा हुआ

सीमाब अकबराबादी

रोज़-ए-फ़िराक़ हर तरफ़ इक इंतिशार था

सीमाब अकबराबादी

अब क्या बताऊँ मैं तिरे मिलने से क्या मिला

सीमाब अकबराबादी

सूरज की तपती धूप ने मारा है इन दिनों

सीमा शर्मा मेरठी

पूछ मत कल आइने में क्या हुआ

सीमा शर्मा मेरठी

एक मंज़र में कई बार उसे देख के देख

सीमा नक़वी

हुआ दे कर दबे शो'लों को भड़काया नहीं जाता

सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर

कुछ भी न अब कहेंगे क़फ़स में ज़बाँ से हम

सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी

कुछ भी न अब कहेंगे क़फ़स में ज़बाँ से हम

सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी

आँख के साहिल पर आते ही अश्क हमारे डूब गए

सय्यद ज़िया अल्वी

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