दूर Poetry (page 25)

तो क्या

सय्यद अयाज़ महमूद

सर-ब-सर बदला हुआ देखा था कल यार का रंग

सावन शुक्ला

वीरानियों के ख़ार तो फूलों की छुवन भी

सौरभ शेखर

घर के बाहर भी तो झाँका जा सकता है

सौरभ शेखर

हिन्दू हैं बुत-परस्त मुसलमाँ ख़ुदा-परस्त

मोहम्मद रफ़ी सौदा

हर संग में शरार है तेरे ज़ुहूर का

मोहम्मद रफ़ी सौदा

बरहमन बुत-कदे के शैख़ बैतुल्लाह के सदक़े

मोहम्मद रफ़ी सौदा

बार-हा दिल को मैं समझा के कहा क्या क्या कुछ

मोहम्मद रफ़ी सौदा

ऐ दीदा ख़ानुमाँ तू हमारा डुबो सका

मोहम्मद रफ़ी सौदा

ख़्वाहिश है कि ख़ुद को भी कभी दूर से देखूँ

सऊद उस्मानी

हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को

सऊद उस्मानी

नज़रों की तरह लोग नज़ारे की तरह हम

सऊद उस्मानी

कुछ और अकेले हुए हम घर से निकल कर

सऊद उस्मानी

हैरत से तकता है सहरा बारिश के नज़राने को

सऊद उस्मानी

दीवार पे रक्खा हुआ मिट्टी का दिया मैं

सऊद उस्मानी

दिल में रक्खे हुए आँखों में बसाए हुए शख़्स

सऊद उस्मानी

अजीब ढंग से मैं ने यहाँ गुज़ारा किया

सऊद उस्मानी

उन को है ए'तिदाल मुझे इंतिहा पसंद

सत्यपाल जाँबाज़

ख़ून-ए-दिल से रह-ए-हस्ती को फ़रोज़ाँ कर लें

सत्यपाल जाँबाज़

बहार-ए-गुल से अब दौर-ए-ख़िज़ाँ तक

सत्यपाल जाँबाज़

इन्ना लिल्लाही ओ इन्ना इलैहि राजेऊन

सत्यपाल आनंद

जो दूर से हमें अक्सर ख़ुदा सा लगता है

सत्य नन्द जावा

हमारे जिस्म ने जिस जिस्म को बुलाया है

सत्य नन्द जावा

पस-ए-आइना ख़द-ओ-ख़ाल में कोई और था

सत्तार सय्यद

तुम्हारी मुंतज़िर यूँ तो हज़ारों घर बनाती हूँ

सरवत ज़ेहरा

जो लोग रह गए हैं मिरी दास्ताँ से दूर

सरवर नेपाली

सुब्ह को चैन न हो शाम को आराम न हो

सरवर आलम राज़

जिस क़दर शिकवे थे सब हर्फ़-ए-दुआ होने लगे

सरवर आलम राज़

पानी का हाथ

सरवत हुसैन

जब शाम हुई मैं ने क़दम घर से निकाला

सरवत हुसैन

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