नदी Poetry (page 23)

मुस्तक़र की ख़्वाहिश में मुंतशिर से रहते हैं

साबिर

क़लम को इस लिए तलवार करना

सबीहा सबा, पाकिस्तान

मैं दरिया हूँ मगर दोनों तरफ़ साहिल है तन्हाई

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं

सबा अफ़ग़ानी

ये किस हसीन ने लोगों को रोक रक्खा है

रूही कंजाही

वीरान ख़्वाहिश

रियाज़ लतीफ़

उस पार

रियाज़ लतीफ़

ग़ैबी दुनियाओं से तन्हा क्यूँ आता है

रियाज़ लतीफ़

ये सीधे जो अब ज़ुल्फ़ों वाले हुए हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

हर एक जिस्म पे बस एक ही से गहने लगे

रिन्द साग़री

सदमे गुज़रे ईज़ा गुज़री

रिन्द लखनवी

दीद-ए-गुलज़ार-ए-जहाँ क्यूँ न करें सैर तो है

रिन्द लखनवी

छुप के घर ग़ैर के जाया न करो

रिन्द लखनवी

बुझा बुझा के जलाता है दिल का शो'ला कौन

रिफ़अत सरोश

ये जो मुझ पर निखार है साईं

रहमान फ़ारिस

हसीन दुनिया उजड़ गई तो

रेहान अल्वी

दुनिया-दारी से ना-वाक़िफ़ कैसा पागल लड़का था

रज़्ज़ाक़ अरशद

सौ रहा था तो शोर बरपा था

रज़ी तिर्मिज़ी

यूँ तो लिखने के लिए क्या नहीं लिक्खा मैं ने

राज़ी अख्तर शौक़

था मिरी जस्त पे दरिया बड़ी हैरानी में

राज़ी अख्तर शौक़

शायद अब रूदाद-ए-हुनर में ऐसे बाब लिखे जाएँगे

राज़ी अख्तर शौक़

जभी तो ज़ख़्म भी गहरा नहीं है

राज़ी अख्तर शौक़

दस्तक सी ये क्या थी कोई साया है कि मैं हूँ

राज़ी अख्तर शौक़

चढ़ते हुए दरिया की अलामत नज़र आए

रज़ा हमदानी

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ को हम-रिश्ता-ए-जाँ कहता हूँ

रविश सिद्दीक़ी

भूली-बिसरी ख़्वाहिशों का बोझ आँखों पर न रख

रौनक़ रज़ा

गुमाँ हद्द-ए-नज़र तक क्या था लेकिन क्या नज़र आया

रौनक़ नईम

तुम भी इस सूखते तालाब का चेहरा देखो

रउफ़ रज़ा

कोई ज़ख़्म खुला तो सहने लगे कोई टीस उठी लहराने लगे

रउफ़ रज़ा

इसी बिखरे हुए लहजे पे गुज़ारे जाओ

रउफ़ रज़ा

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