नदी Poetry (page 25)

रूह में घोर अंधेरे को उतरने न दिया

राम रियाज़

रौशनी वाले तो दुनिया देखें

राम रियाज़

मैं अँधेरों का पुजारी हूँ मिरे पास न आ

राम रियाज़

अब के इस तरह तिरे शहर में खोए जाएँ

राम रियाज़

राज़-ए-हस्ती से आश्ना न हुआ

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

ज़माँ मकाँ थे मिरे सामने बिखरते हुए

राजेन्द्र मनचंदा बानी

शोला इधर उधर कभी साया यहीं कहीं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सर-ब-सर एक चमकती हुई तलवार था मैं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मस्त उड़ते परिंदों को आवाज़ मत दो कि डर जाएँगे

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हमें लपकती हवा पर सवार ले आई

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सुना है ये जहाँ अच्छा था पहले

राजेश रेड्डी

ख़ज़ाना कौन सा उस पार होगा

राजेश रेड्डी

महताब नहीं निकला सितारे नहीं निकले

राजेन्द्र नाथ रहबर

लाज़िम है सोज़-ए-इश्क़ का शोला अयाँ न हो

रजब अली बेग सुरूर

मियाँ के दोस्त

राजा मेहदी अली ख़ाँ

बस इक ख़ता की मुसलसल सज़ा अभी तक है

रईस सिद्दीक़ी

कह रहे थे लोग सहरा जल गया

रईस फ़रोग़

जंगल से आगे निकल गया

रईस फ़रोग़

हवस का रंग ज़ियादा नहीं तमन्ना में

रईस फ़रोग़

गलियों में आज़ार बहुत हैं घर में जी घबराता है

रईस फ़रोग़

आँखों के कश्कोल शिकस्ता हो जाएँगे शाम को

रईस फ़रोग़

आँखें जिन को देख न पाएँ सपनों में बिखरा देना

रईस फ़रोग़

जिस दर पे तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा न रहेगा

रहमत इलाही बर्क़ आज़मी

'मीर' की सादगी बयान में रख

रहमत अमरोहवी

जितने वहशी हैं चले जाते हैं सहरा की तरफ़

राही मासूम रज़ा

एहसास-ए-ज़िम्मेदारी बेदार हो रहा है

राही फ़िदाई

कहाँ न-जाने चला गया इंतिज़ार कर के

इरफ़ान सत्तार

अंधराता

इक़तिदार जावेद

फेंक यूँ पत्थर कि सत्ह-ए-आब भी बोझल न हो

इक़बाल साजिद

मूँद कर आँखें तलाश-ए-बहर-ओ-बर करने लगे

इक़बाल साजिद

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