नदी Poetry (page 42)

आइने से गुज़रने वाला था

औरंगज़ेब

पानी था मगर अपने ही दरिया से जुदा था

अतीक़ुल्लाह

क्या तुम ने कभी ज़िंदगी करते हुए देखा

अतीक़ुल्लाह

मैं इंसान-ए-नौअ' हूँ मैं ईसा-नफ़स हूँ

आतिफ़ ख़ान

एक वो ही शख़्स मुझ को अब गवारा भी नहीं

आतिफ़ ख़ान

तू मिला था और मेरे हाल पर रोया भी था

अतहर नफ़ीस

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं

अतहर नफ़ीस

न मंज़िल हूँ न मंज़िल-आश्ना हूँ

अतहर नफ़ीस

कहीं बुझती है दिल की प्यास इक दो घूँट से 'अनज़र'

अतीक़ अंज़र

सुलगती रेत की क़िस्मत में दरिया लिख दिया जाए

अतीक़ अंज़र

शजर से मिल के जो रोने लगा था

अतीक़ अहमद

मैं अपनी सोचों में एक दरिया बना रहा था

अतीक़ अहमद

वैसे तो इस घर को उस ने चाहे कम ख़ुश-हाली दी

अताउल हसन

तुझ को ख़िफ़्फ़त से बचा लूँ पानी

अता आबिदी

रात और रेल

असरार-उल-हक़ मजाज़

इंक़लाब

असरार-उल-हक़ मजाज़

अँधेरी रात का मुसाफ़िर

असरार-उल-हक़ मजाज़

जानते थे ग़म तिरा दरिया भी था गहरा भी था

असरारुल हक़ असरार

लीडर की दुआ

असरार जामई

सुन कर कितनी आँखें निकलीं

असलम राशिद

मुझे दरिया बनाना चाहती है

असलम राशिद

जब उस की तस्वीर बनाई जाती है

असलम राशिद

आँख से तारे टूट रहे हैं

असलम राशिद

अक्स जल जाएँगे आईने बिखर जाएँगे

असलम महमूद

ज़लज़ले का ख़ौफ़ तारी है दर-ओ-दीवार पर

असलम कोलसरी

ज़द पे आ जाएगा जो कोई तो मर जाएगा

असलम फ़र्रुख़ी

आग सी लग रही है सीने में

असलम फ़र्रुख़ी

नर्म आवाज़ों के बीच

असलम इमादी

यादों का लम्स ज़ेहन को छू कर गुज़र गया

असलम आज़ाद

कभी ऐसा तमव्वुज तुम ने देखा है

असलम अंसारी

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