नदी Poetry (page 40)

कश्तियाँ टूट गई हैं सारी

बाक़ी सिद्दीक़ी

उन का या अपना तमाशा देखो

बाक़ी सिद्दीक़ी

सुब्ह का भेद मिला क्या हम को

बाक़ी सिद्दीक़ी

आस्तीं में साँप इक पलता रहा

बाक़ी सिद्दीक़ी

रोज़-ए-वहशत है मिरे शहर में वीरानी की

बाक़ी अहमदपुरी

दश्त-ओ-दरिया के ये उस पार कहाँ तक जाती

बाक़ी अहमदपुरी

शोर-ए-दरिया है कहानी मेरी

बाक़र नक़वी

खेत से बच कर गुज़रे बस्ती को वीरानी दे

बाक़र नक़वी

दश्त-ए-वफ़ा में ठोकरें खाने का शौक़ था

बाक़र मेहदी

मैं किनारे पे खड़ा हूँ तो कोई बात नहीं

बक़ा बलूच

सब्र-ओ-ज़ब्त की जानाँ दास्ताँ तो मैं भी हूँ दास्ताँ तो तुम भी हो

बक़ा बलूच

कम कम रहना ग़म के सुर्ख़ जज़ीरों में

बक़ा बलूच

अब नहीं दर्द छुपाने का क़रीना मुझ में

बक़ा बलूच

बे-ख़ुदी साथ है मज़े में हूँ

बलवान सिंह आज़र

समाअ'त के लिए इक इम्तिहाँ है

बकुल देव

कौन कहता है ठहर जाना है

बकुल देव

कम न होगी ये सरगिरानी क्या

बकुल देव

अपना बिगड़ा हुआ बनाव लिए

बकुल देव

याँ ख़ाक का बिस्तर है गले में कफ़नी है

ज़फ़र

तुफ़्ता-जानों का इलाज ऐ अहल-ए-दानिश और है

ज़फ़र

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

क़दमों से इतना दूर किनारा कभी न था

बद्र-ए-आलम ख़लिश

नवेद-ए-सफ़र

बद्र वास्ती

जो झुक के मिलते थे जलसों में मेहरबाँ की तरह

बदनाम नज़र

गुम-शुदा मौसम का आँखों में कोई सपना सा था

बदनाम नज़र

तारीक उजालों में बे-ख़्वाब नहीं रहना

अज़रा वहीद

मसअले ज़ेर-ए-नज़र कितने थे

अज़रा वहीद

शहर हो दश्त-ए-तमन्ना हो कि दरिया का सफ़र

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

तेरी यादें हैं जिन्हें दिल में बसा रक्खा है

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

सर-ए-सहरा-ए-जाँ हम चाक-दामानी भी करते हैं

अज़ीज़ नबील

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