नदी Poetry (page 38)

तमाशा मिरे आगे

दिलावर फ़िगार

'ग़ालिब' को बुरा क्यूँ कहो

दिलावर फ़िगार

अल्लामा-'इक़बाल' को शिकवा

दिलावर फ़िगार

वो बहते दरिया की बे-करानी से डर रहा था

दिलावर अली आज़र

मैं इक झूटी कहानी लिख रहा हूँ

धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़

देखते देखते ही साल गुज़र जाता है

धीरेंद्र सिंह फ़य्याज़

इक क़तरे को दरिया समझा मैं भी कैसा पागल हूँ

देवमणि पांडेय

आसानी में जीने में तो ख़र्चा लगता है

दीपक शर्मा दीप

वक़्त की सदियाँ

दाऊद ग़ाज़ी

उम्मीद

दाऊद ग़ाज़ी

निगाह-ए-यार सूँ हासिल है मुझ कूँ मय-नोशी

दाऊद औरंगाबादी

आज बदली है हवा साक़ी पिला जाम-ए-शराब

दाऊद औरंगाबादी

इक ख़्वाब का ख़याल है दुनिया कहें जिसे

दत्तात्रिया कैफ़ी

बहुत मुश्किल है तर्क-ए-आरज़ू रब्त-आश्ना हो कर

दर्शन सिंह

एक सब आग एक सब पानी

दानियाल तरीर

ख़्वाब जज़ीरा बन सकते थे नहीं बने

दानियाल तरीर

फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्यूँकर

दाग़ देहलवी

लोग जिन को आज तक बार-ए-गराँ समझा किए

डी. राज कँवल

दोनों की आरज़ू में चमक बरक़रार है

चित्रांश खरे

कुछ ऐसा पास-ए-ग़ैरत उठ गया इस अहद-ए-पुर-फ़न में

चकबस्त ब्रिज नारायण

आसमाँ है समुंदर पे छाया हुआ

बृजेश अम्बर

याद आता है समाँ मुझ को ख़ुद-आराई का

बिस्मिल इलाहाबादी

यूँ न जान अश्क हमें जो गया बाना न मिला

बिमल कृष्ण अश्क

किधर जाऊँ कहीं रस्ता नहीं है

बिमल कृष्ण अश्क

चाँद को रेशमी बादल से उलझता देखूँ

बिमल कृष्ण अश्क

कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी

भवेश दिलशाद

समुंदरों को भी दरिया समझ रहे हैं हम

भारत भूषण पन्त

रिश्तों के जब तार उलझने लगते हैं

भारत भूषण पन्त

पराया लग रहा था जो वही अपना निकल आया

भारत भूषण पन्त

लाख टकराते फिरें हम सर दर-ओ-दीवार से

भारत भूषण पन्त

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