नदी Poetry (page 36)

हर इक जानिब उन आँखों का इशारा जा रहा है

फ़रहत एहसास

हमेशा का ये मंज़र है कि सहरा जल रहा है

फ़रहत एहसास

देखो अभी लहू की इक धार चल रही है

फ़रहत एहसास

बुझ गए सारे चराग़-ए-जिस्म-ओ-जाँ तब दिल जला

फ़रहत एहसास

बदन और रूह में झगड़ा पड़ा है

फ़रहत एहसास

अभी नहीं कि अभी महज़ इस्तिआरा बना

फ़रहत एहसास

जब तिरी ज़ात को फैला हुआ दरिया समझूँ

फ़रहत अब्बास

सिकंदर हूँ तलाश-ए-आब-ए-हैवाँ रोज़ करता हूँ

फ़रीद परबती

ना-शगुफ़्ता कलियों में शौक़ है तबस्सुम का

फ़रीद जावेद

सारे मंज़र दिलकश थे हर बात सुहानी लगती थी

फ़रह इक़बाल

कहीं सूरज कहीं ज़र्रा चमकता है

फ़राग़ रोहवी

कहीं सूरज कहीं ज़र्रा चमकता है

फ़राग़ रोहवी

जिस दिन से कोई ख़्वाहिश-ए-दुनिया नहीं रखता

फ़राग़ रोहवी

हमारे साथ उमीद-ए-बहार तुम भी करो

फ़राग़ रोहवी

फटी मश्कें लिए दिन-रात दरिया देखने वाले

फ़क़ीह हैदर

या तिरे मुहताज हैं ऐ ख़ून-ए-दिल

फ़ानी बदायुनी

यूँ नज़्म-ए-जहाँ दरहम-ओ-बरहम न हुआ था

फ़ानी बदायुनी

नहीं मंज़ूर तप-ए-हिज्र का रुस्वा होना

फ़ानी बदायुनी

ख़ुद मसीहा ख़ुद ही क़ातिल हैं तो वो भी क्या करें

फ़ानी बदायुनी

जब पुर्सिश-ए-हाल वो फ़रमाते हैं जानिए क्या हो जाता है

फ़ानी बदायुनी

इक फ़साना सुन गए इक कह गए

फ़ानी बदायुनी

दिल की काया ग़म ने वो पल्टी कि तुझ सा बन गया

फ़ानी बदायुनी

ऐ अजल ऐ जान-ए-'फ़ानी' तू ने ये क्या कर दिया

फ़ानी बदायुनी

ग़म से नाज़ुक ज़ब्त-ए-ग़म की बात है

फ़ना निज़ामी कानपुरी

घर हुआ गुलशन हुआ सहरा हुआ

फ़ना निज़ामी कानपुरी

तराना

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शोरिश-ए-ज़ंजीर बिस्मिल्लाह

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मोरी अर्ज सुनो

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हज़र करो मिरे तन से

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ब्लैक-आउट

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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