नदी Poetry (page 39)

ख़्वाब जीने नहीं देंगे तुझे ख़्वाबों से निकल

भारत भूषण पन्त

जुस्तुजू मेरी कहीं थी और मैं भटका कहीं

भारत भूषण पन्त

दानिस्ता जो हो न सके नादानी से हो जाता है

भारत भूषण पन्त

यूँ तो कहने को तिरी राह का पत्थर निकला

बेकल उत्साही

भीतर बसने वाला ख़ुद बाहर की सैर करे मौला ख़ैर करे

बेकल उत्साही

फ़रियाद है अब लब पर जब अश्क-फ़िशानी थी

बहज़ाद लखनवी

हो गया चर्ख़-ए-सितमगर का कलेजा ठंडा

बेदिल हैदरी

ये दिल जो मुज़्तरिब रहता बहुत है

बेदिल हैदरी

भूक चेहरों पे लिए चाँद से प्यारे बच्चे

बेदिल हैदरी

तूर वाले तिरी तनवीर लिए बैठे हैं

बेदम शाह वारसी

मैं यार का जल्वा हूँ

बेदम शाह वारसी

इश्क़ के आसार हैं फिर ग़श मुझे आया देखो

बेदम शाह वारसी

वो दरिया-बार अश्कों की झड़ी है

बयान मेरठी

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है

बशीर बद्र

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना

बशीर बद्र

अगर फ़ुर्सत मिले पानी की तहरीरों को पढ़ लेना

बशीर बद्र

वो सूरत गर्द-ए-ग़म में छुप गई हो

बशीर बद्र

उदासी आसमाँ है दिल मिरा कितना अकेला है

बशीर बद्र

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा

बशीर बद्र

रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना

बशीर बद्र

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता

बशीर बद्र

जब तक निगार-ए-दाश्त का सीना दुखा न था

बशीर बद्र

हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में

बशीर अहमद बशीर

सारे मंज़र फ़ुसूँ तमाशा हैं

बशर नवाज़

रोज़ कहाँ से कोई नया-पन अपने आप में लाएँगे

बशर नवाज़

घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं

बशर नवाज़

बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया

बशर नवाज़

चाँद सा चेहरा जो उस का आश्कारा हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

हिन्द के जाँ-बाज़ सिपाही

बर्क़ देहलवी

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