दीवार Poetry (page 40)

सता रही है बहुत मछलियों की बास मुझे

एहतिशाम अख्तर

ज़ख़्मों को मेरे दिल के सजाओ तो बने बात

एहसान जाफ़री

कभी कभी जो वो ग़ुर्बत-कदे में आए हैं

एहसान दानिश

बिकेगी उस की ही दस्तार तय है

डॉक्टर आज़म

कभी आँसू कभी ख़्वाबों के धारे टूट जाते हैं

दिनेश ठाकुर

कराची की बस

दिलावर फ़िगार

इश्क़ का परचा

दिलावर फ़िगार

ज़हर बीमार को मुर्दे को दवा दी जाए

दिलावर फ़िगार

मंज़र से उधर ख़्वाब की पस्पाई से आगे

दिलावर अली आज़र

मख़्फ़ी हैं अभी दिरहम-ओ-दीनार हमारे

दिलावर अली आज़र

कुछ भी नहीं है ख़ाक के आज़ार से परे

दिलावर अली आज़र

ख़ुद में खिलते हुए मंज़र से नुमूदार हुआ

दिलावर अली आज़र

हवा ने इस्म कुछ ऐसा पढ़ा था

दिलावर अली आज़र

अश्क मेरे अपने

दर्शिका वसानी

एक सब आग एक सब पानी

दानियाल तरीर

चाँद छूने की तलबगार नहीं हो सकती

दानियाल तरीर

तुम आईना ही न हर बार देखते जाओ

दाग़ देहलवी

भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं

दाग़ देहलवी

इंसान नहीं वो जो गुनहगार नहीं हैं

डी. राज कँवल

आओ हुस्न-ए-यार की बातें करें

चराग़ हसन हसरत

गुम-शुदा आदमी का इंतिज़ार

चन्द्रभान ख़याल

सभी सम्तों को ठुकरा कर उड़ी जाए

चंद्र प्रकाश शाद

कैसा वो मौसम था ये तो समझ न पाए हम

चंद्र प्रकाश शाद

हमें बर्बादियों पे मुस्कुराना ख़ूब आता है

चाँदनी पांडे

आसिफ़ुद्दौला का इमामबाड़ा लखनऊ

चकबस्त ब्रिज नारायण

ब-ज़ाहिर तुझ से मिलने का कोई इम्काँ नहीं है

बुशरा फर्रुख

बैठा नहीं हूँ साया-ए-दीवार देख कर

बिस्मिल सईदी

वो अक्स बन के मिरी चश्म-ए-तर में रहता है

बिस्मिल साबरी

ग़ैरों ने ग़ैर जान के हम को उठा दिया

बिस्मिल अज़ीमाबादी

अब रहा क्या है जो अब आए हैं आने वाले

बिस्मिल अज़ीमाबादी

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