दीवार Poetry (page 41)

अब दम-ब-ख़ुद हैं नब्ज़ की रफ़्तार देख कर

बिस्मिल अज़ीमाबादी

सब उम्र तो जारी नहीं रहता है सफ़र भी

बिस्मिल आग़ाई

सभी इंसाँ फ़रिश्ते हो गए हैं

बिमल कृष्ण अश्क

किधर जाऊँ कहीं रस्ता नहीं है

बिमल कृष्ण अश्क

दीवार-ए-काबा 19 नवम्बर 1989

बिलाल अहमद

वो चुप था दीदा-ए-नम बोलते थे

भारत भूषण पन्त

सच्चाइयों को बर-सर-ए-पैकार छोड़ कर

भारत भूषण पन्त

रिश्तों के जब तार उलझने लगते हैं

भारत भूषण पन्त

लाख टकराते फिरें हम सर दर-ओ-दीवार से

भारत भूषण पन्त

ख़्वाहिश-ए-पर्वाज़ है तो बाल-ओ-पर भी चाहिए

भारत भूषण पन्त

लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें

बेख़ुद देहलवी

दिल है मुश्ताक़ जुदा आँख तलबगार जुदा

बेख़ुद देहलवी

ख़ुद अपने जुर्म का मुजरिम को ए'तिराफ़ न था

बेकल उत्साही

बरसों ग़म-ए-गेसू में गिरफ़्तार तो रक्खा

बेगम लखनवी

इश्क़ के आसार हैं फिर ग़श मुझे आया देखो

बेदम शाह वारसी

नक़्श बर-दीवार

बेबाक भोजपुरी

ज़ुल्फ़ तेरी ने परेशाँ किया ऐ यार मुझे

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

हर-चंद मेरे हाल से वो बे-ख़बर नहीं

बासिर सुल्तान काज़मी

ज़ाहिर मिरी शिकस्त के आसार भी नहीं

बशीर सैफ़ी

ज़िंदगी तू ने मुझे क़ब्र से कम दी है ज़मीं

बशीर बद्र

शबनम के आँसू फूल पर ये तो वही क़िस्सा हुआ

बशीर बद्र

सर से पा तक वो गुलाबों का शजर लगता है

बशीर बद्र

मुझ से बिछड़ के ख़ुश रहते हो

बशीर बद्र

ख़ानदानी रिश्तों में अक्सर रक़ाबत है बहुत

बशीर बद्र

अगर तलाश करूँ कोई मिल ही जाएगा

बशीर बद्र

दम-ब-ख़ुद है चाँदनी चुप-चाप हैं अश्जार भी

बशीर मुंज़िर

या मह-ओ-साल की दीवार गिरा दी जाए

बशीर अहमद बशीर

इन चटख़्ते पत्थरों पर पाँव धरना ध्यान से

बशीर अहमद बशीर

दूर तक चारों तरफ़ मेरे सिवा कोई न था

बशीर अहमद बशीर

ऐसा तह-ए-अफ़्लाक ख़राबा नहीं कोई

बशीर अहमद बशीर

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