दीवार Poetry (page 42)

घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं

बशर नवाज़

अबदियत

बशर नवाज़

क्या क्या लोग ख़ुशी से अपनी बिकने पर तय्यार हुए

बशर नवाज़

घटती बढ़ती रौशनियों ने मुझे समझा नहीं

बशर नवाज़

तुझ को देखा तिरे वादे देखे

बाक़ी सिद्दीक़ी

एक दीवार उठाने के लिए

बाक़ी सिद्दीक़ी

दिल की दीवार गिर गई शायद

बाक़ी सिद्दीक़ी

यूँ भी होने का पता देते हैं

बाक़ी सिद्दीक़ी

यूँ भी होने का पता देते हैं

बाक़ी सिद्दीक़ी

सुब्ह का भेद मिला क्या हम को

बाक़ी सिद्दीक़ी

क्यूँ सबा की न हो रफ़्तार ग़लत

बाक़ी सिद्दीक़ी

जुनूँ की राख से मंज़िल में रंग क्या आए

बाक़ी सिद्दीक़ी

हर तरफ़ बिखर हैं रंगीं साए

बाक़ी सिद्दीक़ी

दिल से बाहर हैं ख़रीदार अभी

बाक़ी सिद्दीक़ी

दिल जिंस-ए-मोहब्बत का ख़रीदार नहीं है

बाक़ी सिद्दीक़ी

दश्त-ओ-दरिया के ये उस पार कहाँ तक जाती

बाक़ी अहमदपुरी

दस्त-ए-नासेह जो मिरे जेब को इस बार लगा

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

टूटे शीशे की आख़िरी नज़्म

बाक़र मेहदी

तबाह हो के भी इक अपनी आन बाक़ी है

बाक़र मेहदी

क्यूँ छुपाते हो किधर जाना है

बलवान सिंह आज़र

कहीं भी ज़िंदगी अपनी गुज़ार सकता था

लराज बख़्शी

यकायक अक्स धुँदलाने लगे हैं

बकुल देव

हमें देखा न कर उड़ती नज़र से

बकुल देव

क़ातिल हुआ ख़मोश तो तलवार बोल उठी

बख़्श लाइलपूरी

धूप बढ़ते ही जुदा हो जाएगा

बहराम तारिक़

हम-कलामी में दर-ओ-दीवार से

बहराम तारिक़

पान की सुर्ख़ी नहीं लब पर बुत-ए-ख़ूँ-ख़्वार के

ज़फ़र

इक़रार किसी दिन है तो इंकार किसी दिन

बद्र वास्ती

है बहुत मुश्किल निकलना शहर के बाज़ार में

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

गिरे क़तरों में पत्थर पर सदा ऐसा भी होता है

अज़रा वहीद

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