दीवार Poetry (page 43)

ग़ुबार-ए-जाँ पस-ए-दीवार-ओ-दर समेटा है

अज़रा वहीद

हार-सिंगार

अज़रा नक़वी

सेल्फ-पोर्ट्रेट

अज़रा अब्बास

इस ज़िंदगी के बदले

अज़रा अब्बास

ये जो दीवार अँधेरों ने उठा रक्खी है

अज़्म शाकरी

ख़ाक उड़ाते हुए ये म'अरका सर करना है

अज़्म शाकरी

कहीं गोयाई के हाथों समाअत रो रही है

अज़्म बहज़ाद

माँगना ख़्वाहिश-ए-दीदार से आगे क्या है

अज़लान शाह

ख़ल्वत हुई है अंजुमन-आरा कभी कभी

अज़ीज़ तमन्नाई

बढ़ने दे अभी कशमकश-ए-तार-ए-नफ़स और

अज़ीज़ तमन्नाई

न जाने कैसी महरूमी पस-ए-रफ़्तार चलती है

अज़ीज़ नबील

उस की सोचें और उस की गुफ़्तुगू मेरी तरह

अज़ीज़ नबील

न जाने कैसी महरूमी पस-ए-रफ़्तार चलती है

अज़ीज़ नबील

आएँगे नज़र सुब्ह के आसार में हम लोग

अज़ीज़ नबील

वो निगाहें क्या कहूँ क्यूँ कर रग-ए-जाँ हो गईं

अज़ीज़ लखनवी

देख कर हर दर-ओ-दीवार को हैराँ होना

अज़ीज़ लखनवी

खुला ये दिल पे कि तामीर-ए-बाम-ओ-दर है फ़रेब

अज़ीज़ हामिद मदनी

जूयान-ए-ताज़ा-कारी-ए-गुफ़्तार कुछ कहो

अज़ीज़ हामिद मदनी

हिकायत-ए-हुस्न-ए-यार लिखना हदीस-ए-मीना-ओ-जाम कहना

अज़ीज़ हामिद मदनी

हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

हवा आशुफ़्ता-तर रखती है हम आशुफ़्ता-हालों को

अज़ीज़ हामिद मदनी

जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर

अज़ीज़ एजाज़

जैसे कोई रोता है गले प्यार से लग कर

अज़ीज़ एजाज़

लगाए पीठ बैठी सोचती रहती थी मैं जिस से

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

जिन को दीवार-ओ-दर भी ढक न सके

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

फूँक देंगे मिरे अंदर के उजाले मुझ को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मिरे मिज़ाज को सूरज से जोड़ता क्यूँ है

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

किस क़दर कम-असास हैं कुछ लोग

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

एक दिए ने सदियों क्या क्या देखा है बतलाए कौन

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़ौक़-ए-अमल के सामने दूरी सिमट गई

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

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