देख Poetry (page 29)

बढ़ती रही हर साल जो तादाद हमारी

सरफ़राज़ शाहिद

लाख हो माज़ी दामन-गीर

सरदार सोज़

ज़ाहिद नमाज़ भूला इधर देख कर तुझे

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

उन बुतों से रब्त तोड़ा चाहिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

रह कर मकान में मिरे मेहमान जाइए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

देखा किसी का हम ने न ऐसा सुना दिमाग़

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ब-जुज़ साया तन-ए-लाग़र को मेरे कोई क्या समझे

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ये लफ़्ज़ लफ़्ज़ शोला-बयानी उसी की है

सदार आसिफ़

लाख समझाया मगर ज़िद पे अड़ी है अब भी

सदार आसिफ़

तेरा मेरा झगड़ा क्या जब इक आँगन की मिट्टी है

सरदार अंजुम

शायद मिट्टी मुझे फिर पुकारे

सारा शगुफ़्ता

चाँद का क़र्ज़

सारा शगुफ़्ता

आधा कमरा

सारा शगुफ़्ता

आप उठ रहे हैं क्यूँ मिरे आज़ार देख कर

साक़िब लखनवी

मैं नहीं कहता कि दुनिया को बदल कर राह चल

साक़िब लखनवी

इबरत-ए-दहर हो गया जब से छुपा मज़ार में

साक़िब लखनवी

हज़ार फूल लिए मौसम-ए-बहार आए

साक़िब लखनवी

ये कैसी बात हुई है कि देख कर ख़ुश है

साक़ी फ़ारुक़ी

वही जीने की आज़ादी वही मरने की जल्दी है

साक़ी फ़ारुक़ी

प्यास बढ़ती जा रही है बहता दरिया देख कर

साक़ी फ़ारुक़ी

शेर-इमदाद-अली का मेडक

साक़ी फ़ारुक़ी

सदमा

साक़ी फ़ारुक़ी

ज़मानों के ख़राबों में उतर कर देख लेता हूँ

साक़ी फ़ारुक़ी

वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन

साक़ी फ़ारुक़ी

वो ख़ुश-ख़िराम कि बुर्ज-ए-ज़वाल में न मिला

साक़ी फ़ारुक़ी

वो आग हूँ कि नहीं चैन एक आन मुझे

साक़ी फ़ारुक़ी

सोच में डूबा हुआ हूँ अक्स अपना देख कर

साक़ी फ़ारुक़ी

सफ़र की धूप में चेहरे सुनहरे कर लिए हम ने

साक़ी फ़ारुक़ी

रेत की सूरत जाँ प्यासी थी आँख हमारी नम न हुई

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली

साक़ी फ़ारुक़ी

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