देख Poetry (page 60)
लाख टकराते फिरें हम सर दर-ओ-दीवार से
भारत भूषण पन्त
किसी भी सम्त निकलूँ मेरा पीछा रोज़ होता है
भारत भूषण पन्त
दीद की तमन्ना में आँख भर के रोए थे
भारत भूषण पन्त
दयार-ए-ज़ात में जब ख़ामुशी महसूस होती है
भारत भूषण पन्त
आब की तासीर में हूँ प्यास की शिद्दत में हूँ
भारत भूषण पन्त
आइना देख के ख़ुर्शीद पे करते हैं नज़र
बेख़ुद देहलवी
आइना देख कर वो ये समझे
बेख़ुद देहलवी
वो देखते जाते हैं कनखियों से इधर भी
बेख़ुद देहलवी
टूटे पड़ते हैं ये हैं किस के ख़रीदार तमाम
बेख़ुद देहलवी
क़यामत है जो ऐसे पर दिल-ए-उम्मीद-वार आए
बेख़ुद देहलवी
पछताओगे फिर हम से शरारत नहीं अच्छी
बेख़ुद देहलवी
क्यूँ कह के दिल का हाल उसे बद-गुमाँ करूँ
बेख़ुद देहलवी
ख़ुदा रक्खे तुझे मेरी बुराई देखने वाले
बेख़ुद देहलवी
कब तक करेंगे जब्र दिल-ए-ना-सुबूर पर
बेख़ुद देहलवी
दोनों ही की जानिब से हो गर अहद-ए-वफ़ा हो
बेख़ुद देहलवी
दिल चुरा ले गई दुज़्दीदा-नज़र देख लिया
बेख़ुद देहलवी
बेताब रहें हिज्र में कुछ दिल तो नहीं हम
बेख़ुद देहलवी
अदू को देख के जब वो इधर को देखते हैं
बेख़ुद देहलवी
दैर-ओ-हरम को देख लिया ख़ाक भी नहीं
बेखुद बदायुनी
इस बज़्म में न होश रहेगा ज़रा मुझे
बेखुद बदायुनी
फ़रिश्ते देख रहे हैं ज़मीन ओ चर्ख़ का रब्त
बेकल उत्साही
नज़र की फ़त्ह कभी क़ल्ब की शिकस्त लगे
बेकल उत्साही
मुझ को शिकस्तगी का क़लक़ देर तक रहा
बेकल उत्साही
फ़स्ल-ए-गुल कब लुटी नहीं मालूम
बेकल उत्साही
दिल मेरा तेरा ताब-ए-फ़रमाँ है क्या करूँ
बहज़ाद लखनवी
सहारा मौजों का ले ले के बढ़ रहा हूँ मैं
बेदम शाह वारसी
क़स्र-ए-जानाँ तक रसाई हो किसी तदबीर से
बेदम शाह वारसी
क़फ़स की तीलियों से ले के शाख़-ए-आशियाँ तक है
बेदम शाह वारसी
पास-ए-अदब मुझे उन्हें शर्म-ओ-हया न हो
बेदम शाह वारसी
मुझ से छुप कर मिरे अरमानों को बर्बाद न कर
बेदम शाह वारसी
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