दिल Poetry (page 135)

कहीं तुम अपनी क़िस्मत का लिखा तब्दील कर लेते

सलीम कौसर

इस आलम-ए-हैरत-ओ-इबरत में कुछ भी तो सराब नहीं होता

सलीम कौसर

दिल तुझे नाज़ है जिस शख़्स की दिलदारी पर

सलीम कौसर

दस्त-ए-दुआ को कासा-ए-साइल समझते हो

सलीम कौसर

चराग़-ए-याद की लौ हम-सफ़र कहाँ तक है

सलीम कौसर

बस इक रस्ता है इक आवाज़ और एक साया है

सलीम कौसर

अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं

सलीम कौसर

आब ओ हवा है बरसर-ए-पैकार कौन है

सलीम कौसर

शाख़-दर-शाख़ तिरी याद की हरियाली है

सलीम फ़िगार

मैं रात हव्वा

सलीम फ़िगार

सहमे नहीफ़ दरिया के धारे की बात कर

सलीम फ़िगार

खो दिए हैं चाँद कितने इक सितारा माँग कर

सलीम फ़िगार

फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ में शाख़ से पत्ता निकाल दे

सलीम फ़िगार

दीद के बदले सदा दीदा-ए-तर रक्खा है

सलीम फ़िगार

दीद के बदले सदा दीदा-ए-तर रक्खा है

सलीम फ़िगार

चमकती ओस की सूरत गुलों की आरज़ू होना

सलीम फ़िगार

ये ख़याल अब तो दिल-आज़ार हमारे लिए है

सलीम फ़राज़

उसे ख़ुद को बदल लेना गवारा भी नहीं होता

सलीम फ़राज़

तिरी निगाह की जब से मुआवनत न रही

सलीम फ़राज़

सुहाने ख़्वाब आँखों में संजोना चाहता हूँ

सलीम फ़राज़

कुछ नए ख़्वाब हर इक फ़स्ल में पाले गए हैं

सलीम फ़राज़

कम रंज मौसम-ए-गुल-ए-तर ने नहीं दिया

सलीम फ़राज़

फ़स्ल-ए-जुनूँ में दामन-ओ-दिल चाक भी नहीं

सलीम फ़राज़

एक तो दुनिया का कारोबार है

सलीम फ़राज़

अभी मौजूद थी लेकिन अभी गुम हो गई है

सलीम फ़राज़

नाईट-कलब

सलीम बेताब

जी में आता है कि इक रोज़ ये मंज़र देखें

सलीम बेताब

आँख के कुंज में इक दश्त-ए-तमन्ना ले कर

सलीम बेताब

ज़मीं यख़-बस्ता हो जाती है जब जाड़ों की रातों में

सलीम अहमद

वो मिरे दिल की रौशनी वो मिरे दाग़ ले गई

सलीम अहमद

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