दिल Poetry (page 133)

धूप पीछा नहीं छोड़ेगी ये सोचा भी नहीं

सलमा शाहीन

चश्म-ए-नम पहले शफ़क़ बन के सँवरना चाहे

सलमा शाहीन

अब ख़यालों का जहाँ और न आबाद करें

सलमा शाहीन

मुख़ालिफ़ जब से आईना हुआ है

सलीम शुजाअ अंसारी

ख़ाक-बस्ता हैं तह-ए-ख़ाक से बाहर न हुए

सलीम शुजाअ अंसारी

कभी मिली है जो फ़ुर्सत तो ये हिसाब किया

सलीम शुजाअ अंसारी

हज़ारों रंज मिले सैंकड़ों मलाल मिले

सलीम शुजाअ अंसारी

ग़ुबार-ए-फ़िक्र को तहरीर करता रहता हूँ

सलीम शुजाअ अंसारी

दिल में औरों के लिए कीना-ओ-कद रखते हैं

सलीम शुजाअ अंसारी

धड़कनें बन के जो सीने में रहा करता था

सलीम शुजाअ अंसारी

ज़माँ मकाँ से भी कुछ मावरा बनाने में

सालिम सलीम

सुकूत-ए-अर्ज़-ओ-समा में ख़ूब इंतिशार देखूँ

सालिम सलीम

पस-ए-निगाह कोई लौ भड़कती रहती है

सालिम सलीम

नए जहानों का इक इस्तिआरा कर के लाओ

सालिम सलीम

कुछ भी नहीं है बाक़ी बाज़ार चल रहा है

सालिम सलीम

हंगामा-ए-सुकूत बपा कर चुके हैं हम

सालिम सलीम

दालान में कभी कभी छत पर खड़ा हूँ मैं

सालिम सलीम

बदन सिमटा हुआ और दश्त-ए-जाँ फैला हुआ है

सालिम सलीम

मिरे वहम-ओ-गुमाँ से भी ज़ियादा टूट जाता है

सलीम साग़र

कहीं पे चीख़ होगी और कहीं किलकारियां होंगी

सलीम रज़ा रीवा

हँस दे तो खिले कलियाँ गुलशन में बहार आए

सलीम रज़ा रीवा

सितारे की तरह सीने में दिल डूबा किया लेकिन

सालिक लखनवी

अपनी ख़ुद्दारी सलामत दिल का आलम कुछ सही

सालिक लखनवी

वुसअ'त-ए-दामान-ए-दिल को ग़म तुम्हारा मिल गया

सालिक लखनवी

नहीं इक बार भी अब सुनने की ताक़त दिल में

सालिक देहलवी

मुझ ना-तवाँ पे हश्र में वहम-ए-फुग़ाँ ग़लत

सालिक देहलवी

इक एक हर्फ़ की रखनी है आबरू मुझ को

सलीम सिद्दीक़ी

यक़ीं की धूप में साया भी कुछ गुमान का है

सलीम सिद्दीक़ी

ख़्वाहिश-ए-तख़्त न अब दिरहम-ओ-दीनार की गूँज

सलीम सिद्दीक़ी

यक़ीन है कि वो मेरी ज़बाँ समझता है

सलीम शहज़ाद

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