दिल Poetry (page 134)

रंग ताबीर का टूटे हुए ख़्वाबों में नहीं

सलीम शहज़ाद

वो ख़ूँ बहा कि शहर का सदक़ा उतर गया

सलीम शाहिद

उस को मिल कर देख शायद वो तिरा आईना हो

सलीम शाहिद

रौशन सुकूत सब उसी शो'ला-बयाँ से है

सलीम शाहिद

क़ाइल करूँ किस बात से मैं तुझ को सितमगर

सलीम शाहिद

मुर्दा रगों में ख़ून की गर्मी कहाँ से आई

सलीम शाहिद

मत पूछ कि इस पैकर-ए-ख़ुश-रंग में क्या है

सलीम शाहिद

क्या मेरा इख़्तियार ज़मान-ओ-मकान पर

सलीम शाहिद

जुरअत-ए-इज़हार का उक़्दा यहाँ कैसे खुले

सलीम शाहिद

हूँ मैं भी वही मेरा मुक़ाबिल भी वही है

सलीम शाहिद

घर के दरवाज़े खुले हों चोर का खटका न हो

सलीम शाहिद

दिल भर आए और अब्र-ए-दीदा में पानी न हो

सलीम शाहिद

तू ने ग़म ख़्वाह-मख़ाह उस का उठाया हुआ है

सलीम सरफ़राज़

तिरी निगाह की जब से मुआ'विनत न रही

सलीम सरफ़राज़

ज़लील-ओ-ख़्वार होती जा रही है

सलीम मुहीउद्दीन

'सलीम' अब तक किसी को बद-दुआ दी तो नहीं लेकिन

सलीम कौसर

कभी इश्क़ करो और फिर देखो इस आग में जलते रहने से

सलीम कौसर

वो जो हम-रही का ग़ुरूर था वो सवाद-ए-राह में जल-बुझा

सलीम कौसर

वो जो आए थे बहुत मंसब-ओ-जागीर के साथ

सलीम कौसर

तुम ने सच बोलने की जुरअत की

सलीम कौसर

तिलिस्म-ख़ाना-ए-अस्बाब मेरे सामने था

सलीम कौसर

क़ुर्बतें होते हुए भी फ़ासलों में क़ैद हैं

सलीम कौसर

फिर जी उठे हैं जिस से वो इम्कान तुम नहीं

सलीम कौसर

मैं उसे तुझ से मिला देता मगर दिल मेरे

सलीम कौसर

लौ को छूने की हवस में एक चेहरा जल गया

सलीम कौसर

लय मोहब्बत की है आहंग सुख़न-साज़ का है

सलीम कौसर

कुछ भी था सच के तरफ़-दार हुआ करते थे

सलीम कौसर

कोई याद ही रख़्त-ए-सफ़र ठहरे कोई राहगुज़र अनजानी हो

सलीम कौसर

किस की तहवील में थे किस के हवाले हुए लोग

सलीम कौसर

कैसे हंगामा-ए-फ़ुर्सत में मिले हैं तुझ से

सलीम कौसर

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