दिल Poetry (page 136)

सच तो कह दूँ मगर इस दौर के इंसानों को

सलीम अहमद

क़ुर्ब-ए-बदन से कम न हुए दिल के फ़ासले

सलीम अहमद

न जाने शेर में किस दर्द का हवाला था

सलीम अहमद

मैं वो मअ'नी-ए-ग़म-ए-इश्क़ हूँ जिसे हर्फ़ हर्फ़ लिखा गया

सलीम अहमद

मैं ग़म को बसा रहा हूँ दिल में

सलीम अहमद

जिस आग से दिल सुलग रहे थे

सलीम अहमद

हाल-ए-दिल ना-गुफ़्तनी है हम जो कहते भी तो क्या

सलीम अहमद

हाल-ए-दिल कौन सुनाए उसे फ़ुर्सत किस को

सलीम अहमद

बदन की आग को कहते हैं लोग झूटी आग

सलीम अहमद

आँसुओं से तू है ख़ाली दर्द से आरी हूँ मैं

सलीम अहमद

नींद से पहले

सलीम अहमद

ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है

सलीम अहमद

ये ख़्वाब और भी देखेंगे रात बाक़ी है

सलीम अहमद

वो मिरे दिल की रौशनी वो मिरे दाग़ ले गई

सलीम अहमद

वो लोग भी हैं जो मौजों से डर गए होंगे

सलीम अहमद

वस्ल ओ फ़स्ल की हर मंज़िल में शामिल इक मजबूरी थी

सलीम अहमद

उम्र भर काविश-ए-इज़हार ने सोने न दिया

सलीम अहमद

तिरी जानिब से दिल में वसवसे हैं

सलीम अहमद

स्वाँग भरता हूँ तिरे शहर में सौदाई का

सलीम अहमद

समाअतों को अमीन-ए-नवा-ए-राज़ किया

सलीम अहमद

'सलीम' दिल को मयस्सर सकूँ ज़रा न हुआ

सलीम अहमद

नया मज़मूँ किताब-ए-ज़ीस्त का हूँ

सलीम अहमद

न पूछो अक़्ल की चर्बी चढ़ी है उस की बोटी पर

सलीम अहमद

न जाने शेर में किस दर्द का हवाला था

सलीम अहमद

मेरी ग़ज़ल में एक नया सोज़-ए-जाँ भी है

सलीम अहमद

मजबूरियों का पास भी कुछ था वफ़ा के साथ

सलीम अहमद

लम्हा-ए-रफ़्ता का दिल में ज़ख़्म सा बन जाएगा

सलीम अहमद

कुछ हैं मंज़र हाल के कुछ ख़्वाब मुस्तक़बिल के हैं

सलीम अहमद

किसी दश्त का लब-ए-ख़ुश्क हूँ जो न पाए मुज़्दा-ए-आब तक

सलीम अहमद

किन नक़ाबों में है मस्तूर वो हुस्न-ए-मा'सूम

सलीम अहमद

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