दिल Poetry (page 137)

ख़ैर का तुझ को यक़ीं है और उस को शर का है

सलीम अहमद

कल नशात-ए-क़ुर्ब से मौसम बहार-अंदाज़ा था

सलीम अहमद

जो दिल में हैं दाग़ जल रहे हैं

सलीम अहमद

जो बात दिल में थी वो कब ज़बान पर आई

सलीम अहमद

जो आँखों के तक़ाज़े हैं वो नज़्ज़ारे बनाता हूँ

सलीम अहमद

इश्क़ में जिस के ये अहवाल बना रक्खा है

सलीम अहमद

इश्क़ और नंग-ए-आरज़ू से आर

सलीम अहमद

इश्क़ और इतना मोहज़्ज़ब छोड़ कर दीवाना-पन

सलीम अहमद

हम हैं और राह-ए-कू-ए-बदनामी

सलीम अहमद

एक ख़ुश्बू दिल-ओ-जाँ से आई

सलीम अहमद

दिल हुस्न को दान दे रहा हूँ

सलीम अहमद

दीदनी है हमारी ज़ेबाई

सलीम अहमद

बज़्म आख़िर हुई शम्ओं' का धुआँ बाक़ी है

सलीम अहमद

बजा ये रौनक़-ए-महफ़िल मगर कहाँ हैं वो लोग

सलीम अहमद

अहल-ए-दिल ने इश्क़ में चाहा था जैसा हो गया

सलीम अहमद

सौ बार आई होंटों पे झूटी हँसी मगर

सलाम संदेलवी

मुझ को तो ख़ून-ए-दिल ही पीना है

सलाम संदेलवी

ताबानी-ए-रुख़ ले कर तुम सामने जब आए

सलाम संदेलवी

वो दिल से तंग आ के आज महफ़िल में हुस्न की तमकनत की ख़ातिर

सलाम मछली शहरी

रात दिल को था सहर का इंतिज़ार

सलाम मछली शहरी

ग़म मुसलसल हो तो अहबाब बिछड़ जाते हैं

सलाम मछली शहरी

ये धरती ख़ूब-सूरत है

सलाम मछली शहरी

तसलसुल

सलाम मछली शहरी

मुझे वो नज़्म लिखनी है

सलाम मछली शहरी

मज़दूर लड़की

सलाम मछली शहरी

मजबूरियाँ

सलाम मछली शहरी

कश्मकश

सलाम मछली शहरी

गुरेज़

सलाम मछली शहरी

अस्पताल

सलाम मछली शहरी

आज फिर ये कह रहा हूँ

सलाम मछली शहरी

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