दिल Poetry (page 156)

अश्क-बारी नहीं फ़ुर्क़त में शरर-बारी है

सबा अकबराबादी

अजल होती रहेगी इश्क़ कर के मुल्तवी कब तक

सबा अकबराबादी

आईना बन जाइए जल्वा-असर हो जाइए

सबा अकबराबादी

सामने उन को पाया तो हम खो गए आज फिर हसरत-ए-गुफ़्तुगू रह गई

सबा अफ़ग़ानी

कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं

सबा अफ़ग़ानी

भूल जाना था तो फिर अपना बनाया क्यूँ था

सबा अफ़ग़ानी

तुम्हें परवा न हो मुझ को तो जिंस-ए-दिल की परवा है

साइल देहलवी

हमेशा ख़ून-ए-दिल रोया हूँ मैं लेकिन सलीक़े से

साइल देहलवी

ज़ोम न कीजो शम्अ-रू बज़्म के सोज़ ओ साज़ पर

साइल देहलवी

उड़ा सकता नहीं कोई मिरे अंदाज़-ए-शेवन को

साइल देहलवी

सुना भी कभी माजरा दर्द-ओ-ग़म का किसी दिल-जले की ज़बानी कहो तो

साइल देहलवी

हमें कहती है दुनिया ज़ख़्म-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर वाले

साइल देहलवी

बसा-औक़ात आ जाते हैं दामन से गरेबाँ में

साइल देहलवी

अमानत मोहतसिब के घर शराब-ए-अर्ग़वाँ रख दी

साइल देहलवी

उदास मौसम के रतजगों में

सादुल्लाह शाह

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

क्यूँ न हम सोच के साँचे में ही ढल कर देखें

सादुल्लाह शाह

हम कि चेहरे पे न लाए कभी वीरानी को

सादुल्लाह शाह

दर्द को अश्क बनाने की ज़रूरत क्या थी

सादुल्लाह शाह

मुस्तक़िल अब बुझा बुझा सा है

एस ए मेहदी

इन में क्या फ़र्क़ है अब इस का भी एहसास नहीं

एस ए मेहदी

दोनों हों कैसे एक जा 'मेहदी' सुरूर-ओ-सोज़-ए-दिल

एस ए मेहदी

मुस्तक़िल अब बुझा बुझा सा है

एस ए मेहदी

कैसे करूँ मैं ज़ब्त-ए-राज़ तू ही मुझे बता कि यूँ

एस ए मेहदी

कैफ़-ए-सुरूर-ओ-सोज़ के क़ाबिल नहीं रहा

एस ए मेहदी

बनते ही शहर का ये देखिए वीराँ होना

एस ए मेहदी

दिल सदा तड़पे है मेरा मुर्ग़-ए-बिस्मिल की तरह

राय सरब सुख दिवाना

यूँ आज अपने-आप से उलझा हुआ हूँ मैं

रूही कंजाही

ये सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर यूँही नहीं है

रूही कंजाही

ये किस हसीन ने लोगों को रोक रक्खा है

रूही कंजाही

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