दिल Poetry (page 155)

किस को बताते किस से छुपाते सुराग़-ए-दिल

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

जहाँ में जिस की शोहरत कू-ब-कू है

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

इदराक ही मुहाल है ख़्वाब-ओ-ख़याल का

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

अगर अल्फ़ाज़ से ग़म का इज़ाला हो गया होता

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

आँखों में वो आएँ तो हँसाते हैं मुझे ख़्वाब

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

शाख़ों पर जब पत्ते हिलने लगते हैं

सबा नुसरत

क्यूँ ढूँढती रहती हूँ उसे सारे जहाँ में

सबा नुसरत

क़लम से राब्ता-ए-रंग-ओ-आब टूट गया

सबा नक़वी

नग़्मा-ज़न है नज़र-ए-बे-आवाज़

सबा नक़वी

ज़िंदगानी हँस के तय अपना सफ़र कर जाएगी

सबा इकराम

इन पत्थरों के शहर में दिल का गुज़र कहाँ

सबा इकराम

आवाज़ के पत्थर जो कभी घर में गिरे हैं

सबा इकराम

मैं बाज़गश्त-ए-दिल हूँ पैहम शिकस्त-ए-दिल हूँ

सबा अख़्तर

आ जा अँधेरी रातें तन्हा बिता चुका हूँ

सबा अख़्तर

ये हमीं हैं कि तिरा दर्द छुपा कर दिल में

सबा अकबराबादी

रौशनी ख़ुद भी चराग़ों से अलग रहती है

सबा अकबराबादी

ख़्वाहिशों ने दिल को तस्वीर-ए-तमन्ना कर दिया

सबा अकबराबादी

जब इश्क़ था तो दिल का उजाला था दहर में

सबा अकबराबादी

ऐसा भी कोई ग़म है जो तुम से नहीं पाया

सबा अकबराबादी

यगाना बन के हो जाए वो बेगाना तो क्या होगा

सबा अकबराबादी

उस का वादा ता-क़यामत कम से कम

सबा अकबराबादी

उलझनों में कैसे इत्मीनान-ए-दिल पैदा करें

सबा अकबराबादी

उजाला कर के ज़ुल्मत में घिरा हूँ

सबा अकबराबादी

सोना था जितना अहद-ए-जवानी में सो लिए

सबा अकबराबादी

पूरी मिरे जुनूँ की ज़रूरत न कर सके

सबा अकबराबादी

कसरत-ए-जल्वा को आईना-ए-वहदत समझो

सबा अकबराबादी

जवानी ज़िंदगानी है न तुम समझे न हम समझे

सबा अकबराबादी

इस रंग में अपने दिल-ए-नादाँ से गिला है

सबा अकबराबादी

हुस्न जो रंग ख़िज़ाँ में है वो पहचान गया

सबा अकबराबादी

ग़ालिबन मेरे अलावा कोई गुज़रा भी नहीं

सबा अकबराबादी

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