दिल Poetry (page 157)

तुझ पे हर हाल में मरना चाहूँ

रूही कंजाही

पुर-हौल ख़राबों से शनासाई मिरी है

रूही कंजाही

मुंसिफ़-वक़्त से बेगाना गुज़रना होगा

रूही कंजाही

मोजज़ा कोई दिखाऊँ भी तो क्या

रूही कंजाही

किस लिए फिरता हूँ तन्हा न किसी ने पूछा

रूही कंजाही

इस शोला-ख़ू की तरह बिगड़ता नहीं कोई

रूही कंजाही

और अभी तेज़ दौड़ना है मुझे

रूही कंजाही

उसी हसीं से चमन में बहार आज भी है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

तिलिस्म-ए-नश्शा-ए-दुनिया भी आज ख़त्म हुआ

रोहित सोनी ‘ताबिश’

रू-ए-ज़मीं नहीं कि सर-ए-आसमाँ नहीं

रोहित सोनी ‘ताबिश’

जब कि सारी काएनात उस की निगहबानी में है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

हवा-ए-जिंदगी भी कूचा-ए-क़ातिल से आती है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

ज़बान पे नाला-ओ-फ़रियाद के सिवा क्या है

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

वो अपनी आन में गुम है मैं अपनी आन में गुम

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

तुम्हारी याद तुम्हारा ख़याल काफ़ी है

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

था निगाहों में बसाया जाने किस तस्वीर को

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

कोई ख़्वाब था जो बिखर गया कोई दर्द था जो ठहर गया

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

कभी तो मंज़रों के इस तिलिस्म से उभर सकूँ

रियाज़ लतीफ़

ना-मुकम्मल तआरुफ़

रियाज़ लतीफ़

ख़ुद अपना इंतिज़ार भी

रियाज़ लतीफ़

ख़ला की रूह किस लिए हो मेरे इख़्तियार में

रियाज़ लतीफ़

हर एक ख़लिया को आईना घर बनाते हुए

रियाज़ लतीफ़

हदों के न होने की ज़िल्लत से हारे हुए

रियाज़ लतीफ़

गुज़र चुके हैं बदन से आगे नजात का ख़्वाब हम हुए हैं

रियाज़ लतीफ़

ये कम-बख़्त इक जहान-ए-आरज़ू है

रियाज़ ख़ैराबादी

शोख़ी से हर शगूफ़े के टुकड़े उड़ा दिए

रियाज़ ख़ैराबादी

मेहंदी लगाए बैठे हैं कुछ इस अदा से वो

रियाज़ ख़ैराबादी

कह के मैं दिल की कहानी किस क़दर खोया गया

रियाज़ ख़ैराबादी

दिल-जलों से दिल-लगी अच्छी नहीं

रियाज़ ख़ैराबादी

आलम-ए-हू में कुछ आवाज़ सी आ जाती है

रियाज़ ख़ैराबादी

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