दिल Poetry (page 225)

गुलशन की फ़ज़ा धुआँ धुआँ है

हबीब जालिब

घर के ज़िंदाँ से उसे फ़ुर्सत मिले तो आए भी

हबीब जालिब

दिल-ए-पुर-शौक़ को पहलू में दबाए रक्खा

हबीब जालिब

दिल वालो क्यूँ दिल सी दौलत यूँ बे-कार लुटाते हो

हबीब जालिब

दिल की बात लबों पर ला कर अब तक हम दुख सहते हैं

हबीब जालिब

दयार-ए-'दाग़'-ओ-'बेख़ुद' शहर-ए-देहली छोड़ कर तुझ को

हबीब जालिब

दरख़्त सूख गए रुक गए नदी नाले

हबीब जालिब

चूर था ज़ख़्मों से दिल ज़ख़्मी जिगर भी हो गया

हबीब जालिब

भुला भी दे उसे जो बात हो गई प्यारे

हबीब जालिब

बड़े बने थे 'जालिब' साहब पिटे सड़क के बीच

हबीब जालिब

बातें तो कुछ ऐसी हैं कि ख़ुद से भी न की जाएँ

हबीब जालिब

आग है फैली हुई काली घटाओं की जगह

हबीब जालिब

शब-ए-फ़ुर्क़त है ठहरते नहीं शोले दिल में

हबीब मूसवी

क़दमों पे डर के रख दिया सर ताकि उठ न जाएँ

हबीब मूसवी

मय-कदे को जा के देख आऊँ ये हसरत दिल में है

हबीब मूसवी

किसी सूरत से हुई कम न हमारी तशवीश

हबीब मूसवी

जो ले लेते हो यूँ हर एक का दिल बातों बातों में

हबीब मूसवी

वो यूँ शक्ल-ए-तर्ज़-ए-बयाँ खींचते हैं

हबीब मूसवी

वो उट्ठे हैं तेवर बदलते हुए

हबीब मूसवी

उस से क्या छुप सके बनाई बात

हबीब मूसवी

शराब पी जान तन में आई अलम से था दिल कबाब कैसा

हबीब मूसवी

शब को नाला जो मिरा ता-ब-फ़लक जाता है

हबीब मूसवी

शब कि मुतरिब था शराब-ए-नाब थी पैमाना था

हबीब मूसवी

सब में हूँ फिर किसी से सरोकार भी नहीं

हबीब मूसवी

रोना इन का काम है हर दम जल जल कर मर जाना भी

हबीब मूसवी

कोई बात ऐसी आज ऐ मेरी गुल-रुख़्सार बन जाए

हबीब मूसवी

किसी की जुब्बा-साई से कभी घिसता नहीं पत्थर

हबीब मूसवी

जबीन पर क्यूँ शिकन है ऐ जान मुँह है ग़ुस्से से लाल कैसा

हबीब मूसवी

जब शाम हुई दिल घबराया लोग उठ के बराए सैर चले

हबीब मूसवी

हुए ख़ल्क़ जब से जहाँ में हम हवस-ए-नज़ारा-ए-यार है

हबीब मूसवी

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