दिल Poetry (page 253)

अफ़्साना-ए-शब-रंग

फ़रीद इशरती

जला के दामन-ए-हस्ती का तार तार उठा

फ़रीद इशरती

है दाग़ दाग़ मिरा दिल मगर मलूल नहीं

फ़रीद इशरती

दिल में शगुफ़्ता गुल भी हैं रौशन चराग़ भी

फ़रीद इशरती

ये दिल है दिल इसे सीने में हरगिज़

फ़राज़ सुल्तानपूरी

वो अक्स-ए-दिल-ए-आश्ना छोड़ आए

फ़राज़ सुल्तानपूरी

निकल के घर से और मैदाँ में आ के

फ़राज़ सुल्तानपूरी

इक दिल की ख़ातिर इतने तो फ़ित्ने कभी न थे

फ़राज़ सुल्तानपूरी

बिछड़ते दामनों में अपनी कुछ परछाइयाँ रख दो

फ़राज़ सुल्तानपूरी

अश्क-ए-ग़म आँखों ने बरसाया बहुत

फ़राज़ सुल्तानपूरी

ज़िंदगी चुपके से इक बात कहा करती है

फ़रह इक़बाल

ज़रा सी रात ढल जाए तो शायद नींद आ जाए

फ़रह इक़बाल

ज़माना झुक गया होता अगर लहजा बदल लेते

फ़रह इक़बाल

वो मेरे बारे में ऐसे भी सोचता कब था

फ़रह इक़बाल

शिकायत हम नहीं करते रिआ'यत वो नहीं करते

फ़रह इक़बाल

सारे मंज़र दिलकश थे हर बात सुहानी लगती थी

फ़रह इक़बाल

राख उड़ती हुई बालों में नज़र आती है

फ़रह इक़बाल

मोहब्बत का दिया ऐसे बुझा था

फ़रह इक़बाल

कोई जब मिल के मुस्कुराया था

फ़रह इक़बाल

कैसे मंज़र हैं जो इदराक में आ जाते हैं

फ़रह इक़बाल

कहें हम क्या किसी से दिल की वीरानी नहीं जाती

फ़रह इक़बाल

हमें तो साथ चलने का हुनर अब तक नहीं आया

फ़रह इक़बाल

एक मुद्दत से यहाँ ठहरा हुआ पानी है

फ़रह इक़बाल

दर्द का समुंदर है सिर्फ़ पार होने तक

फ़रह इक़बाल

दिमाग़ अहल-ए-मोहब्बत का साथ देता नहीं

फ़राग़ रोहवी

मैं एक बूँद समुंदर हुआ तो कैसे हुआ

फ़राग़ रोहवी

लबों के सामने ख़ाली गिलास रखते हैं

फ़राग़ रोहवी

ख़ूब निभेगी हम दोनों में मेरे जैसा तू भी है

फ़राग़ रोहवी

कमी ज़रा सी अगर फ़ासले में आ जाए

फ़राग़ रोहवी

जो भी अंजाम हो आग़ाज़ किए देते हैं

फ़राग़ रोहवी

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