दिल Poetry (page 307)

ज़िंदगी कैसे लगी दीवार से

अज़हर अब्बास

पंछियों की किसी क़तार के साथ

अज़हर अब्बास

किस ने कहा कि चुप हूँ मियाँ बोलता नहीं

अज़हर अब्बास

हवा-ए-तेज़ के आगे कहाँ रहेगा कोई

अज़हर अब्बास

देख क़िंदील रुख़-ए-यार की जानिब मत देख

अज़हर अब्बास

अपने वीराने का नुक़सान नहीं चाहता मैं

अज़हर अब्बास

खिड़कियाँ खोल के कैसी ये सदाएँ आईं

अज़ीज़ परीहारी

ये फूल जो मिट्टी के हयूलों से अटा है

अज़ीम कुरेशी

वो शोख़ दिल-ओ-जाँ की तमन्ना तो न निकला

अज़ीम कुरेशी

सुरूर-ए-इश्क़ की मस्ती कहाँ है सब के लिए

अज़ीम कुरेशी

सहरा का कोई फूल मोअ'त्तर तो नहीं था

अज़ीम कुरेशी

इश्क़ अपना अजब तमाशा है

अज़ीम कुरेशी

ये और बात है कि मदावा-ए-ग़म न था

अज़ीम मुर्तज़ा

वही यकसानियत-ए-शाम-ओ-सहर है कि जो थी

अज़ीम मुर्तज़ा

महरूमी के दुख और तन्हाई के रंज उठाए

अज़ीम मुर्तज़ा

लाई न सबा बू-ए-चमन अब के बरस भी

अज़ीम मुर्तज़ा

जब से है वो रौनक़-ए-महफ़िल आँखों में

अज़ीम मुर्तज़ा

फ़ित्ना-सामाँ ही नहीं फ़ित्ना-ए-सामाँ निकले

अज़ीम मुर्तज़ा

यक़ीं बनाता है कोई गुमाँ बनाता है

आज़र तमन्ना

इस से पहले कि घर के पर्दों से

आज़र अस्करी

दिल को रहीन-ए-लज़्ज़त-ए-दरमाँ न कर सके

आज़म चिश्ती

कभी नाकामियों का अपनी हम मातम नहीं करते

आज़ाद गुरदासपुरी

आप जिस रह-गुज़र-ए-दिल से कभी गुज़रे थे

आज़ाद गुलाटी

वो रूह के गुम्बद में सदा बन के मिलेगा

आज़ाद गुलाटी

वो जो किसी का रूप धार कर आया था

आज़ाद गुलाटी

तुम्हारे पास रहें हम तो मौत भी क्या है

आज़ाद गुलाटी

लम्हा लम्हा इक नई सई-ए-बक़ा करती हुई

आज़ाद गुलाटी

किस ने सदा दी कौन आया है

आज़ाद गुलाटी

ख़ुद हमीं को राहतों के कैफ़ का चसका न था

आज़ाद गुलाटी

हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ

आज़ाद गुलाटी

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