दिल Poetry (page 310)

नाक़ूस की सदाओं से और न अज़ान से

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

आसमाँ गर्दिश में था सारी ज़मीं चक्कर में थी

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

शिकायत है बहुत लेकिन गिला अच्छा नहीं लगता

अतीक़ असर

हर्फ़ लर्ज़ां हैं कि होंटों पे वो आएँ कैसे?

अतीक़ असर

घटा ज़ुल्फ़ों की जब से और काली होती जाती है

अतीक़ असर

शाम के धुँदलकों में डूबता है यूँ सूरज

अतीक़ अंज़र

कहीं बुझती है दिल की प्यास इक दो घूँट से 'अनज़र'

अतीक़ अंज़र

दूर मुझ से रहते हैं सारे ग़म ज़माने के

अतीक़ अंज़र

उदास बैठा दिए ज़ख़्म के जलाए हुए

अतीक़ अंज़र

सुलगती रेत की क़िस्मत में दरिया लिख दिया जाए

अतीक़ अंज़र

फूल पर ओस है आरिज़ पे नमी हो जैसे

अतीक़ अंज़र

मिरे दिल में ख़ुश्बू बसी थी जो वो मकान अपना बदल गई

अतीक़ अंज़र

जिस्म के घरौंदे में आग शोर करती है

अतीक़ अंज़र

गुज़िश्ता रात कोई चाँद घर में उतरा था

अतीक़ अंज़र

दिल के आँगन में तिरी याद का तारा चमका

अतीक़ अंज़र

बा'द मुद्दत मिले कुछ कहा न सुना भर गए ज़ख़्म पुरवाइयाँ सो गईं

अतीक़ अंज़र

अश्क इन आँखों से हम दिल में बहा कर देखें

अतीक़ अंज़र

'अतीक़' बुझता भी कैसे चराग़-ए-दिल मेरा

अतीक़ इलाहाबादी

अगरचे लाई थी कल रात कुछ नजात हवा

अतीक़ इलाहाबादी

शजर से मिल के जो रोने लगा था

अतीक़ अहमद

मैं अपनी ख़ाक को जब आइना बनाता हूँ

अतीक़ अहमद

दिल की दहलीज़ पे दिलबर आया

अतीब एजाज़

किसे दिमाग़ कि उलझे तिलिस्म-ए-ज़ात के साथ

अताउर्रहमान क़ाज़ी

शोहरत-ए-फ़न बहुत हुई दाद कमाल दे गए

अताउर्रहमान जमील

माना कि सितारे सर-ए-अफ़्लाक बहुत हैं

अताउर्रहमान जमील

किसी और को मैं तिरे सिवा नहीं चाहता

अताउल हसन

वो सुकून-ए-जिस्म-ओ-जाँ गिर्दाब-ए-जाँ होने को है

अताउल हक़ क़ासमी

वो गर्द है कि वक़्त से ओझल तो मैं भी हूँ

अताउल हक़ क़ासमी

वो एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है

अताउल हक़ क़ासमी

वह एक शख़्स कि मंज़िल भी रास्ता भी है

अताउल हक़ क़ासमी

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