दिल Poetry (page 32)

मिरे वजूद को पामाल करना चाहता है

वक़ार मानवी

ख़ुशी दामन-कशाँ है दिल असीर-ए-ग़म है बरसों से

वक़ार मानवी

अगर रोना ही अब मेरा मुक़द्दर है मोहब्बत में

वक़ार मानवी

ज़ियादा सोचने वाले तुझे पता नहीं है

वक़ार ख़ान

ज़ख़्म खाते हैं जी जलाते हैं

वक़ार ख़ान

वो ज़िम्मेदारी कितनी ख़ुशी से निभाई थी

वक़ार ख़ान

मन की मय हो तो पियाले नहीं देखे जाते

वक़ार ख़ान

ख़ता क़ुबूल नहीं है तो ख़ुद ख़ता कर देख

वक़ार ख़ान

देख पगली न दल लगा मिरे साथ

वक़ार ख़ान

बे-मिस्ल-ओ-बे-हिसाब उजालों के बा'द भी

वक़ार ख़ान

ज़िंदगी इतनी बे-मज़ा क्यूँ है

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

ज़हर के घूँट पी रहे हैं हम

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

मुद्दआ' हासिल मिरा हो कर रहा

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

मज़ा था हम को जो बुलबुल से दू-बदू करते

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

कुएँ जो पानी की बिन प्यास चाह रखते हैं

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

इक-बटा-दो को करूँ क्यूँ न रक़म दो-बटा-चार

वक़ार हिल्म सय्यद नगलवी

वो निगाह मिल के निगाह से ब-अदा-ए-ख़ास झिझक गई

वक़ार बिजनोरी

उन की चश्म-ए-मस्त में पोशीदा इक मय-ख़ाना था

वक़ार बिजनोरी

तुम ख़फ़ा क्या हुए हयात गई

वक़ार बिजनोरी

रह-ए-कहकशाँ से गुज़र गया हमा-ईन-ओ-आँ से गुज़र गया

वक़ार बिजनोरी

मस्त नज़रों का इल्तिफ़ात न पूछ

वक़ार बिजनोरी

ग़म-ए-मोहब्बत है कार-फ़रमा दुआ से पहले असर से पहले

वक़ार बिजनोरी

एक इशारे में बदल जाता है मयख़ाने का नाम

वक़ार बिजनोरी

चश्म-ए-यक़ीं से देखिए जल्वा-गह-ए-सिफ़ात में

वक़ार बिजनोरी

ये माना शीशा-ए-दिल रौनक़-ए-बाज़ार-ए-उल्फ़त है

वामिक़ जौनपुरी

लाख आबाद-ए-तमन्ना हो के दिल

वामिक़ जौनपुरी

अगर ग़ुबार हो दिल में अगर हो तंग-नज़र

वामिक़ जौनपुरी

मुदावा

वामिक़ जौनपुरी

माँ

वामिक़ जौनपुरी

कार्ल मार्क्स

वामिक़ जौनपुरी

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