दिल Poetry (page 30)

रंग और रूप से जो बाला है

वज़ीर आग़ा

धार सी ताज़ा लहू की शबनम-अफ़्शानी में है

वज़ीर आग़ा

बे-ज़बाँ कलियों का दिल मैला किया

वज़ीर आग़ा

बे-सदा दम-ब-ख़ुद फ़ज़ा से डर

वज़ीर आग़ा

ये तूफ़ान-ए-हवादिस और तलातुम बाद ओ बाराँ के

वासिफ़ देहलवी

क़दम यूँ बे-ख़तर हो कर न मय-ख़ाने में रख देना

वासिफ़ देहलवी

कितनी घटाएँ आईं बरस कर गुज़र गईं

वासिफ़ देहलवी

जो रंग-ए-इश्क़ से फ़ारिग़ हो उस को दिल नहीं कहते

वासिफ़ देहलवी

हल्की सी ख़लिश दिल में निगाहों में उदासी

वासिफ़ देहलवी

दीदार से पहले ही क्या हाल हुआ दिल का

वासिफ़ देहलवी

दामन के दाग़ अश्क-ए-नदामत ने धो दिए

वासिफ़ देहलवी

आज रुख़्सत हो गया दुनिया से इक बीमार-ए-ग़म

वासिफ़ देहलवी

ज़र्रा हरीफ़-ए-मेहर दरख़्शाँ है आज कल

वासिफ़ देहलवी

वो जल्वा तूर पर जो दिखाया न जा सका

वासिफ़ देहलवी

तिरी उल्फ़त में जितनी मेरी ज़िल्लत बढ़ती जाती है

वासिफ़ देहलवी

क़दम यूँ बे-ख़तर हो कर न मय-ख़ाने में रख देना

वासिफ़ देहलवी

नसीम-ए-सुब्ह यूँ ले कर तिरा पैग़ाम आती है

वासिफ़ देहलवी

नहीं मालूम कितने हो चुके हैं इम्तिहाँ अब तक

वासिफ़ देहलवी

किसी के इश्क़ का ये मुस्तक़िल आज़ार क्या कहना

वासिफ़ देहलवी

खुलने ही लगे उन पर असरार-ए-शबाब आख़िर

वासिफ़ देहलवी

कहते हैं सर-ए-राह मुनासिब नहीं मिलना

वासिफ़ देहलवी

कभी दर्द-आश्ना तेरा भी क़ल्ब शादमाँ होगा

वासिफ़ देहलवी

हरीम-ए-नाज़ को हम ग़ैर की महफ़िल नहीं कहते

वासिफ़ देहलवी

हम-सफ़र थम तो सही दिल को सँभालूँ तो चलूँ

वासिफ़ देहलवी

बुझते हुए चराग़ फ़रोज़ाँ करेंगे हम

वासिफ़ देहलवी

बयाँ ऐ हम-नशीं ग़म की हिकायत और हो जाती

वासिफ़ देहलवी

मुझे ख़बर थी कि अब लौट कर न आऊँगा

वसी शाह

हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर

वसी शाह

तो मैं भी ख़ुश हूँ कोई उस से जा के कह देना

वसी शाह

समुंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं

वसी शाह

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