दिल Poetry (page 324)

दिल में याद-ए-बुत-ए-बे-पीर लिए बैठा हूँ

आरज़ू लखनवी

दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया

आरज़ू लखनवी

भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो

आरज़ू लखनवी

बग़ौर देख रहा है अदा-शनास मुझे

आरज़ू लखनवी

अयाँ है बे-रुख़ी चितवन से और ग़ुस्सा निगाहों से

आरज़ू लखनवी

ऐ मिरे ज़ख़्म-ए-दिल-नवाज़ ग़म को ख़ुशी बनाए जा

आरज़ू लखनवी

ऐ जज़्ब-ए-मोहब्बत तू ही बता क्यूँकर न असर ले दिल ही तो है

आरज़ू लखनवी

आँख से दिल में आने वाला

आरज़ू लखनवी

आने में झिझक मिलने में हया तुम और कहीं हम और कहीं

आरज़ू लखनवी

तक़दीर हो ख़राब तो तदबीर क्या करे

अरुण कुमार आर्य

माँगने से क़ज़ा नहीं मिलती

अरुण कुमार आर्य

दिल की बाज़ी लगा के देख लिया

अरुण कुमार आर्य

चोट दिल पर लगे और आह ज़बाँ से निकले

अरुण कुमार आर्य

अजीब चीज़ है ये शौक़-ए-आरज़ू-मंदी

अर्शी भोपाली

तमाम हुस्न-ए-जहाँ का जवाब हो के रहा

अर्शी भोपाली

रक़्स-ए-आशुफ़्ता-सरी की कोई तदबीर सही

अर्शी भोपाली

निगाह-ए-शौक़ से कब तक मुक़ाबला करते

अर्शी भोपाली

निगाह तेज़ शुऊ'र-ए-बुलंद रखते हैं

अर्शी भोपाली

मता-ए-शौक़ तो है दर्द-ए-रोज़गार तो है

अर्शी भोपाली

ख़ुलूस-ए-अल्फ़ाज़ काम आया निगाह-ए-अहल-ए-फ़ितन से पहले

अर्शी भोपाली

फ़लसफ़ी किस लिए इल्ज़ाम-ए-फ़ना देता है

अर्शी भोपाली

आग़ाज़-ए-आशिक़ी का अल्लाह रे ज़माना

अर्शी भोपाली

वीराँ वीराँ बाम-ओ-दर मैं और मिरी तन्हाई

अरशदुल क़ादरी

सब रंग वही ढंग वही नाज़ वही थे

अरशदुल क़ादरी

वो जिस ने मेरे दिल ओ जाँ में दर्द बोया है

अरशद सिद्दीक़ी

क़ल्ब-ओ-नज़र का सुकूँ और कहाँ दोस्तो

अरशद सिद्दीक़ी

फ़ज़ाएँ कैफ़-ए-बहाराँ से जब महकती हैं

अरशद सिद्दीक़ी

शाम ढलते ही दिल के आँगन से

अरशद नईम

जो बुझ गए थे चराग़ फिर से जला रहा है

अरशद नईम

तुम्हारे जम्परों पर साड़ियों पर और ग़रारों पर

अरशद मीर

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