दिल Poetry (page 47)

दिल की बात न मानी होती इश्क़ किया क्यूँ पीरी में

तौसीफ़ तबस्सुम

बजा कि दरपय-ए-आज़ार चश्म-ए-तर है बहुत

तौसीफ़ तबस्सुम

अजीब रंग थे दिल में जो आँसुओं में न थे

तौसीफ़ तबस्सुम

आख़िर ख़ुद अपने ही लहू में डूब के सर्फ़-ए-विग़ा होगे

तौसीफ़ तबस्सुम

बदन में दिल था मुअल्लक़ ख़ला में नज़रें थीं

तौक़ीर तक़ी

परी उड़ जाएगी और राजधानी ख़त्म होगी

तौक़ीर तक़ी

कोई तासीर तो है इस की नवा में ऐसी

तौक़ीर तक़ी

कहीं शुऊर में सदियों का ख़ौफ़ ज़िंदा था

तौक़ीर तक़ी

दर्द जब से दिल-नशीं है इश्क़ है

तौक़ीर तक़ी

वो जो इक इल्ज़ाम था उस पर कहीं

तौक़ीर रज़ा

आ गई धूप मिरी छाँव के पीछे पीछे

तौक़ीर रज़ा

नादान मेरा दिल बहक जाए न कहीं

तौक़ीर अहमद

पलकों को तेरी शर्म से झुकता हुआ मैं देखूँ

तौक़ीर अहमद

कर के सारी हदों को पार चला

तौक़ीर अहमद

सदाक़त सादगी ओढ़े बुलंदी थाम लेती है

ताैफ़ीक़ साग़र

रेशम रेशम तितली देखूँ ख़्वाब-नगर की वादी में

ताैफ़ीक़ साग़र

मिरी सच्चाई हर सूरत तिरी मुट्ठी से निकलेगी

ताैफ़ीक़ साग़र

सदियों लहू से दिल की हिकायत लिखी गई

तसनीम फ़ारूक़ी

किसी ने पूछा जो उम्र-ए-रवाँ के बारे में

तसनीम आबिदी

हमारी क़ुर्बतों में फ़ासला न रह जाए

तसनीम आबिदी

एक सन्नाटा सा तक़रीर में रक्खा गया था

तसनीम आबिदी

बे-तलब कर के ज़रूरत भी चली जाए अगर

तसनीम आबिदी

'तस्कीन' करूँ क्या दिल-ए-मुज़्तर का इलाज अब

मीर तस्कीन देहलवी

करता हूँ तेरी ज़ुल्फ़ से दिल का मुबादला

मीर तस्कीन देहलवी

उस कू मैं हुए हम वो लब-ए-बाम न आया

मीर तस्कीन देहलवी

तू क्यूँ पास से उठ चला बैठे बैठे

मीर तस्कीन देहलवी

रहने वालों को तिरे कूचे के ये क्या हो गया

मीर तस्कीन देहलवी

नाम लोगे जो याँ से जाने का

मीर तस्कीन देहलवी

क्या क्या मज़े से रात की अहद-ए-शबाब में

मीर तस्कीन देहलवी

कर सके दफ़्न न उस कूचे में अहबाब मुझे

मीर तस्कीन देहलवी

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