दिल Poetry (page 45)
बाहर बाहर सन्नाटा है अंदर अंदर शोर बहुत
उमर अंसारी
बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है
उमैर नजमी
यहाँ हम ने किसी से दिल लगाया ही नहीं 'मंज़र'
उमैर मंज़र
कभी इक़रार होना था कभी इंकार होना था
उमैर मंज़र
दिल की जो आग थी कम उस को भी होने न दिया
उमा शंकर चित्रवंशी बाज़ल
बसंत और होली की बहार
उफ़ुक़ लखनवी
निगाहें नीची रखते हैं बुलंदी के निशाँ वाले
तुर्फ़ा क़ुरैशी
इश्क़ में हर तमन्ना-ए-क़ल्ब-ए-हज़ीं सुर्ख़ आँसू बहाए तो मैं क्या करूँ
तुर्फ़ा क़ुरैशी
ग़ज़ल का सिलसिला था याद होगा
तुफ़ैल चतुर्वेदी
शिद्दत-ए-इज़हार-ए-मज़मूँ से है घबराई हुई
तुफ़ैल बिस्मिल
फूल होंटों को ग़ज़ल-ख़्वाँ देखना
तुफ़ैल बिस्मिल
जो भी तेरी आँख को भा जाएगा
तुफ़ैल बिस्मिल
मुस्कुराएगा मगर बात नहीं मानेगा
तुफ़ैल अहमद मदनी
जीना है तो जीने की पहली सी अदा माँगो
तुफ़ैल अहमद मदनी
कितनी दिलकश हैं ये बारिश की फुवारें लेकिन
त्रिपुरारि
जब से गुज़रा है किसी हुस्न के बाज़ार से दिल
त्रिपुरारि
कभी किसी ने जो दिल दुखाया तो दिल को समझा गई उदासी
त्रिपुरारि
जाने फिर उस के दिल में क्या बात आ गई थी
त्रिपुरारि
इस तरह रस्म मोहब्बत की अदा होती है
त्रिपुरारि
भाड़े का इक मकाँ हूँ मुझ को ख़बर नहीं है
त्रिपुरारि
अश्क-दर-अश्क वही लोग रवाँ मिलते हैं
त्रिपुरारि
आइने के रू-ब-रू इक आइना रखता हूँ मैं
तौसीफ ताबिश
दिन में सूरज है मिरी महरूमियों का तर्जुमाँ
तिश्ना बरेलवी
चमन में बर्क़ कभी आशियाँ से दूर नहीं
तिश्ना बरेलवी
मंदिर भी साफ़ हम ने किए मस्जिदें भी पाक
तिलोकचंद महरूम
शहीद भगत-सिंह
तिलोकचंद महरूम
नूर-जहाँ का मज़ार
तिलोकचंद महरूम
ख़ाक-ए-हिंद
तिलोकचंद महरूम
छब्बीस जनवरी
तिलोकचंद महरूम
ज़हे क़िस्मत अगर तुम को हमारा दिल पसंद आया
तिलोकचंद महरूम
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