दिल Poetry (page 65)

दश्त में ये जाँ-फ़ज़ाँ मंज़र कहाँ से आ गए

सुलेमान ख़ुमार

इरफ़ान

सुलैमान अरीब

एक हुज़्निया

सुलैमान अरीब

डीप-फ़्रीज़

सुलैमान अरीब

ये भी शायद तिरा अंदाज़-ए-दिल-आराई है

सुलैमान अरीब

तिरा दिल तो नहीं दिल की लगी हूँ

सुलैमान अरीब

नहीं जो तेरी ख़ुशी लब पे क्यूँ हँसी आए

सुलैमान अरीब

कोई दुश्मन कोई हमदम भी नहीं साथ अपने

सुलैमान अरीब

जो तेरे हुस्न में नर्मी भी बाँकपन भी है

सुलैमान अरीब

हिसाब-ए-उम्र करो या हिसाब-ए-जाम करो

सुलैमान अरीब

आज भी हाथ पे है तेरे पसीने की तरी

सुलैमान अरीब

वो मिज़ाज दिल के बदल गए कि वो कारोबार नहीं रहा

सुलैमान अहमद मानी

तुझे क्या हुआ है बता ऐ दिल न सुकून है न क़रार है

सुलैमान अहमद मानी

नहीं इस दश्त में कोई ख़िज़र है

सुलैमान अहमद मानी

क्यूँ और ज़ख़्म सीने पे खाओ हो दोस्तो

सुलैमान अहमद मानी

अपने ही आप में असीर हूँ मैं

सुलैमान अहमद मानी

किसी की याद में शमएँ जलाना भूल जाता है

सुहैल सानी

न इब्तिदा-ए-जुनूँ है न इंतिहा-ए-जुनूँ

सुहैल काकोरवी

कहाँ तेवर हैं उन में अब वो कल के

सुहैल काकोरवी

हँस दिए ज़ख़्म-ए-जिगर जैसे कि गुल-हा-ए-बहार

सुहैल काकोरवी

बरसों हुए उस से न कोई बात हुई रात

सुहैल काकोरवी

पेड़ ऊँचा है मगर ज़ेर-ए-ज़मीं कितना है

सुहैल अहमद ज़ैदी

उजड़े दिल-ओ-दिमाग़ को आबाद कर सकूँ

सुहैल अहमद ज़ैदी

तमन्ना दिल में घर करती बहुत है

सुहैल अहमद ज़ैदी

साए के लिए है न ठिकाने के लिए है

सुहैल अहमद ज़ैदी

सब तमाशे हो चुके अब घर चलो

सुहैल अहमद ज़ैदी

पेड़ ऊँचा है मगर ज़ेर-ए-ज़मीं कितना है

सुहैल अहमद ज़ैदी

नवाह-ए-जाँ में कहीं अबतरी सी लगती है

सुहैल अहमद ज़ैदी

ख़ैर उस से न सही ख़ुद से वफ़ा कर डालो

सुहैल अहमद ज़ैदी

जब शाम बढ़ी रात का चाक़ू निकल आया

सुहैल अहमद ज़ैदी

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