दिल Poetry (page 67)

नज़र में ढल के उभरते हैं दिल के अफ़्साने

सूफ़ी तबस्सुम

नज़र में ढल के उभरते हैं दिल के अफ़्साने

सूफ़ी तबस्सुम

मोहब्बत किस क़दर सेहर-आफ़रीं मालूम होती है

सूफ़ी तबस्सुम

क्या हुआ जो सितारे चमकते नहीं दाग़ दिल के फ़रोज़ाँ करो दोस्तो

सूफ़ी तबस्सुम

कुछ और गुमरही-ए-दिल का राज़ क्या होगा

सूफ़ी तबस्सुम

किसी में ताब-ए-अलम नहीं है किसी में सोज़-ए-वफ़ा नहीं है

सूफ़ी तबस्सुम

जब अश्क तिरी याद में आँखों से ढले हैं

सूफ़ी तबस्सुम

जाने किस की थी ख़ता याद नहीं

सूफ़ी तबस्सुम

जान दे कर वफ़ा में नाम किया

सूफ़ी तबस्सुम

इस आलम-ए-वीराँ में क्या अंजुमन-आराई

सूफ़ी तबस्सुम

इलाज-ए-दर्द-ए-दिल-ए-सोगवार हो न सका

सूफ़ी तबस्सुम

हुस्न मजबूर-ए-जफ़ा है शायद

सूफ़ी तबस्सुम

हुस्न को जो मंज़ूर हुआ

सूफ़ी तबस्सुम

हर एक नक़्श तिरे पाँव का निशाँ सा है

सूफ़ी तबस्सुम

दिल को आए कि निगाहों को यक़ीं आ जाए

सूफ़ी तबस्सुम

दास्तान-ए-ग़म हम ने कह भी दी तो क्या होगा

सूफ़ी तबस्सुम

बुझी बुझी सी सितारों की रौशनी है अभी

सूफ़ी तबस्सुम

ऐसे भी थे कुछ हालात

सूफ़ी तबस्सुम

आँखें खुली थीं सब की कोई देखता न था

सूफ़ी तबस्सुम

ये जो काली घटा छाई हुई है

सुदर्शन कुमार वुग्गल

याद आती है तिरी यूँ मिरे ग़म-ख़ाने में

सुदर्शन कुमार वुग्गल

जवानी मिरी रंग लाने लगी है

सुदर्शन कुमार वुग्गल

हम से पूछो न दोस्ती का सिला

सुदर्शन फ़ाकिर

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब

सुदर्शन फ़ाकिर

दिल तो रोता रहे ओर आँख से आँसू न बहे

सुदर्शन फ़ाकिर

कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया

सुदर्शन फ़ाकिर

कब करोगे हमारा इस्तिक़बाल

सुबोध लाल साक़ी

सिलसिला ख़त्म कर चले आए

सुभाष पाठक ज़िया

मुझे तो मोहब्बत से इंकार होगा

सुभाष पाठक ज़िया

दुश्मनी में ही सही वो ये करम करता रहा

सुभाष पाठक ज़िया

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