दिल Poetry (page 69)

आप के पाँव के नीचे दिल है

सिराज लखनवी

आँखों पर अपनी रख कर साहिल की आस्तीं को

सिराज लखनवी

आग और धुआँ और हवस और है इश्क़ और

सिराज लखनवी

यौम-ए-आज़ादी

सिराज लखनवी

यूँ सुबुक-दोश हूँ जीने का भी इल्ज़ाम नहीं

सिराज लखनवी

ये वो आज़माइश-ए-सख़्त है कि बड़े बड़े भी निकल गए

सिराज लखनवी

वो ज़कात-ए-दौलत-ए-सब्र भी मिरे चंद अश्कों के नाम से

सिराज लखनवी

तुझे पा के तुझ से जुदा हो गए हम

सिराज लखनवी

क़िस्मत से लड़ती हैं निगाहें

सिराज लखनवी

क़दम तो रख मंज़िल-ए-वफ़ा में बिसात खोई हुई मिलेगी

सिराज लखनवी

निगाह-ए-यार यूँही और चंद पैमाने

सिराज लखनवी

न कुरेदूँ इश्क़ के राज़ को मुझे एहतियात-ए-कलाम है

सिराज लखनवी

मुझे अब हवा-ए-चमन नहीं कि क़फ़स में गूना क़रार है

सिराज लखनवी

मदद ऐ ख़याल-ए-माज़ी ज़रा आइना उठाना

सिराज लखनवी

लिया जन्नत में भी दोज़ख़ का सहारा हम ने

सिराज लखनवी

ख़याल-ए-दोस्त न मैं याद-ए-यार में गुम हूँ

सिराज लखनवी

काफ़िरी में भी जो चाहत होगी

सिराज लखनवी

हर लग़्ज़िश-ए-हयात पर इतरा रहा हूँ मैं

सिराज लखनवी

गुनाहगार हूँ ऐसा रह-ए-नजात में हूँ

सिराज लखनवी

फ़ितरत-ए-इश्क़ गुनहगार हुई जाती है

सिराज लखनवी

दुनिया का न उक़्बा का कोई ग़म नहीं सहते

सिराज लखनवी

बे-समझे-बूझे मोहब्बत की इक काफ़िर ने ईमान लिया

सिराज लखनवी

अश्क-ए-हसरत में क्यूँ लहू है अभी

सिराज लखनवी

अजब सूरत से दिल घबरा रहा है

सिराज लखनवी

अब इतनी अर्ज़ां नहीं बहारें वो आलम-ए-रंग-ओ-बू कहाँ है

सिराज लखनवी

आँखों में आज आँसू फिर डबडबा रहे हैं

सिराज लखनवी

वो आशिक़ी के खेत में साबित क़दम हुआ

सिराज औरंगाबादी

तुझ ज़ुल्फ़ में दिल ने गुम किया राह

सिराज औरंगाबादी

तिरे सलाम के धज देख कर मिरे दिल ने

सिराज औरंगाबादी

ताज़ा रख आब-ए-मेहरबानी सीं

सिराज औरंगाबादी

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