दिल Poetry (page 70)

क़ातिल ने अदा का किया जब वार उछल कर

सिराज औरंगाबादी

नज़र-ए-तग़ाफ़ुल-ए-यार का गिला किस ज़बाँ सीं करूँ बयाँ

सिराज औरंगाबादी

नक़्द-ए-दिल-ए-ख़ालिस कूँ मिरी क़ल्ब तूँ मत जान

सिराज औरंगाबादी

मस्जिद में तुझ भँवों की ऐ क़िबला-ए-दिल-ओ-जाँ

सिराज औरंगाबादी

क्या पूछते हो तुम कि तिरा दिल किधर गया

सिराज औरंगाबादी

किया ख़ाक आतिश-ए-इश्क़ ने दिल-ए-बे-नवा-ए-'सिराज' कूँ

सिराज औरंगाबादी

कभी सम्त-ए-ग़ैब सीं क्या हुआ कि चमन ज़ुहूर का जल गया

सिराज औरंगाबादी

कभी ला ला मुझे देते हो अपने हात सीं प्याला

सिराज औरंगाबादी

जुनूँ के शहर में नीं कम-अयार कूँ हुर्मत

सिराज औरंगाबादी

जिस कूँ तुझ ग़म सीं दिल-शिगाफ़ी है

सिराज औरंगाबादी

जाँ-सिपारी दाग़ कत्था चूना है चश्म-ए-इन्तिज़ार

सिराज औरंगाबादी

फ़िदा कर जान अगर जानी यही है

सिराज औरंगाबादी

दिल ले गया है मुझ कूँ दे उम्मीद-ए-दिल-दही

सिराज औरंगाबादी

दाम-ओ-क़फ़स न चाहिए दिल के शिकार कूँ

सिराज औरंगाबादी

ऐ शोख़ गुलिस्ताँ मैं नहीं ये गुल-ए-रंगीं

सिराज औरंगाबादी

आई है तिरे इश्क़ की बाज़ी दिल-ओ-जाँ पर

सिराज औरंगाबादी

ज़ुल्फ़-ए-मुश्कीन-ए-यार क़हरी है

सिराज औरंगाबादी

ज़ालिम मिरे जिगर कूँ करे क्यूँ न फाँक फाँक

सिराज औरंगाबादी

या-रब कहाँ गया है वो सर्व-ए-शोख़-रा'ना

सिराज औरंगाबादी

यार को बे-हिजाब देखा हूँ

सिराज औरंगाबादी

यार जब पेश-ए-नज़र होता है

सिराज औरंगाबादी

यार गर्म-ए-मेहरबानी हो गया

सिराज औरंगाबादी

यक निगह सें लिया है वो गुलफ़ाम

सिराज औरंगाबादी

उश्शाक़ का दिल दाग़ का अंदाज़ा हुआ महज़

सिराज औरंगाबादी

तुम्हारी ज़ुल्फ़ का हर तार मोहन

सिराज औरंगाबादी

तुझे कहता हूँ ऐ दिल इश्क़ का इज़हार मत कीजो

सिराज औरंगाबादी

तुझ ज़ुल्फ़ की शिकन है मानिंद-ए-दाम गोया

सिराज औरंगाबादी

था बहाना मुझे ज़ंजीर के हिल जाने का

सिराज औरंगाबादी

तिरी ज़ुल्फ़ ज़ुन्नार का तार है

सिराज औरंगाबादी

तिरी निगाह-ए-तलत्तुफ़ ने फ़ैज़ आम किया

सिराज औरंगाबादी

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