दिल Poetry (page 66)

जाँ तन का साथ दे न तो दिल ही वफ़ा करे

सुहैल अहमद ज़ैदी

इसी मामूल-ए-रोज़-ओ-शब में जी का दूसरा होना

सुहैल अहमद ज़ैदी

इम्कान खुले दर का हर आन बहुत रक्खा

सुहैल अहमद ज़ैदी

गए मौसमों को भुला देंगे हम

सुहैल अहमद ज़ैदी

आँखों को मयस्सर कोई मंज़र ही नहीं था

सुहैल अहमद ज़ैदी

होता है मिरे दिल में हसीनों का गुज़र भी

सुहा मुजद्ददी

उठिए तो कहाँ जाइए जो कुछ है यहीं है

सुहा मुजद्ददी

ख़राब-ए-दीद को यूँ ही ख़राब रहने दे

सुहा मुजद्ददी

जो कुछ हुआ सो हुआ अब सवाल ही क्या है

सुहा मुजद्ददी

ज़ब्त की क़ैद-ए-सख़्त ने हम को रिहा नहीं किया

सूफ़िया अनजुम ताज

वो एक लड़की जो ख़ंदा-लब थी न जाने क्यूँ चश्म-तर गई वो

सूफ़िया अनजुम ताज

तिरी याद जो मेरे दिल में है बस उसी की जल्वागरी रही

सूफ़िया अनजुम ताज

साज़ के मौजों पे नग़्मों की सवारी मैं थी

सूफ़िया अनजुम ताज

'अंजुम' पे जो गुज़र गई उस का भला हिसाब क्या

सूफ़िया अनजुम ताज

रोज़ दोहराते थे अफ़्साना-ए-दिल

सूफ़ी तबस्सुम

एक शोला सा उठा था दिल में

सूफ़ी तबस्सुम

तुम आसमाँ की तरफ़ न देखो

सूफ़ी तबस्सुम

मैं आ रहा हूँ

सूफ़ी तबस्सुम

ज़बाँ करती है दिल की तर्जुमानी देखते जाओ

सूफ़ी तबस्सुम

ये क्या कि इक जहाँ को करो वक़्फ़-ए-इज़्तिराब

सूफ़ी तबस्सुम

वो वुसअतें थीं दिल में जो चाहा बना लिया

सूफ़ी तबस्सुम

वो हुस्न को जल्वा-गर करेंगे

सूफ़ी तबस्सुम

वो हुस्न को जल्वा-गर करेंगे

सूफ़ी तबस्सुम

वफ़ा की आख़िरी मंज़िल भी आ रही है क़रीब

सूफ़ी तबस्सुम

तू ने कुछ भी न कहा हो जैसे

सूफ़ी तबस्सुम

तू ने कुछ भी न कहा हो जैसे

सूफ़ी तबस्सुम

तिरी महफ़िल में सोज़-ए-जावेदानी ले के आया हूँ

सूफ़ी तबस्सुम

सायों से लिपट रहे थे साए

सूफ़ी तबस्सुम

सौ बार चमन महका सौ बार बहार आई

सूफ़ी तबस्सुम

रस्म-ए-मेहर-ओ-वफ़ा की बात करें

सूफ़ी तबस्सुम

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