दिल Poetry (page 63)

मेहर-ओ-माह भी लर्ज़ां हैं फ़ज़ा की बाँहों में

सुरूर बाराबंकवी

दस्त-ओ-पा हैं सब के शल इक दस्त-ए-क़ातिल के सिवा

सुरूर बाराबंकवी

चमन वालों को रक़्साँ-ओ-ग़ज़ल-ख़्वाँ ले के उट्ठी है

सुरूर बाराबंकवी

चमन में लाला-ओ-गुल पर निखार भी तो नहीं

सुरूर बाराबंकवी

सुनी है रौशनी के क़त्ल की जब से ख़बर मैं ने

सुरूर अम्बालवी

अपनी अना के गुम्बद-ए-बे-दर में बंद है

सूरज तनवीर

तन्हा अपनी ज़ात लिए फिरता हूँ मैं

सूरज नारायण

हमारे हाल की जा कर उन्हें ख़बर तो करें

सूरज नारायण

आँख लग जाती है फिर भी जागता रहता हूँ मैं

सूरज नारायण

दौर-ए-बरहम बे-मअ'नी

सुनील कुमार जश्न

अजब सी बद-हवासी छा रही है

सुनील कुमार जश्न

अब तो दिल ओ दिमाग़ में कोई ख़याल भी नहीं

सुनील कुमार जश्न

ऐसी ख़ुशबू तू मुझे आज मयस्सर कर दे

सुमन ढींगरा दुग्गल

सो उस को छोड़ दिया उस ने जब वफ़ा नहीं की

सुल्तान सुकून

सो उस को छोड़ दिया उस ने जब वफ़ा नहीं की

सुल्तान सुकून

हुआ नहीं है अभी मुन्हरिफ़ ज़बान से वो

सुल्तान सुकून

वो आज मुझ से जब मिली तो धुँद छट गई

सुलतान सुबहानी

तेरी याद में रोते रोते तुझ जैसा हो जाएगा

सुलतान सुबहानी

देख के मुझ को हँस देता है

सुलतान सुबहानी

अपने ही टूटे हुए ख़्वाबों को दिल चुनता भी है

सुल्तान सब्र वानी

उस की जानिब देखते थे और सब ख़ामोश थे

सुलतान रशक

मौसम-ए-गुल कुंज-ए-गुलशन निकहत-ए-गेसू न हो

सुलतान रशक

लिख रहा हूँ हर्फ़-ए-हक़ हर्फ़-ए-वफ़ा किस के लिए

सुलतान रशक

ख़ुशियाँ न छोड़ अपने लिए ग़म तलब न कर

सुलतान रशक

जो नज़र आता नहीं दीवार में दर और है

सुलतान रशक

धूप की शिद्दत में नंगे पाँव नंगे सर निकल

सुलतान रशक

बड़ी दानाई से अंदाज़-ए-अय्यारी बदलते हैं

सुलतान रशक

वही बे-सबब से निशाँ हर तरफ़

सुल्तान अख़्तर

तिलिस्म-ख़ाना-ए-दिल में है चार-सू रौशन

सुल्तान अख़्तर

तिलिस्म-ए-कार-ए-जहाँ का असर तमाम हुआ

सुल्तान अख़्तर

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