दिन Poetry (page 18)

इन्द्र-धनुष बन जाएँ

सुबोध लाल साक़ी

मैं जुदाई का मुक़र्रर सिलसिला हो जाऊँगा

सुबोध लाल साक़ी

मुझे तो मोहब्बत से इंकार होगा

सुभाष पाठक ज़िया

बढ़ा जो दर्द-ए-जिगर ग़म से दोस्ती कर ली

सुभाष पाठक ज़िया

रग-ए-जाँ में समा जाती हो जानाँ

सुबहान असद

मैं यूँ तो ख़्वाब की ताबीर सोचता भी नहीं

सुबहान असद

अपनी नज़रों में हारना कब तक

सोनरूपा विशाल

रंज इतने मिले ज़माने से

सिया सचदेव

मैं जिस दिन से अकेली हो गई हूँ

सिया सचदेव

जिस दिन से मिरी तुम से शनासाई हुई है

सिया सचदेव

है जो दीवार पर घड़ी तन्हा

सिया सचदेव

बग़ैर-ए-साग़र-ओ-यार-ए-जवाँ नहीं गुज़रे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

बग़ैर साग़र ओ यार-ए-जवाँ नहीं गुज़रे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

ये जज़्र-ओ-मद है पादाश-ए-अमल इक दिन यक़ीनी है

सिराज लखनवी

ये जब्र-ए-ज़िंदगी न उठाएँ तो क्या करें

सिराज लखनवी

मुझे अब हवा-ए-चमन नहीं कि क़फ़स में गूना क़रार है

सिराज लखनवी

ईमाँ की नुमाइश है सज्दे हैं कि अफ़्साने

सिराज लखनवी

अच्छा क़िसास लेना फिर आह-ए-आतिशीं से

सिराज लखनवी

आँखों में आज आँसू फिर डबडबा रहे हैं

सिराज लखनवी

वस्ल के दिन शब-ए-हिज्राँ की हक़ीक़त मत पूछ

सिराज औरंगाबादी

यार को बे-हिजाब देखा हूँ

सिराज औरंगाबादी

सुनो तो ख़ूब है टुक कान धर मेरा सुख़न प्यारे

सिराज औरंगाबादी

रिश्ते में तिरी ज़ुल्फ़ के है जान हमारा

सिराज औरंगाबादी

जिस दिन सीं मैं यार बूझता हूँ

सिराज औरंगाबादी

जब सें तुझ इश्क़ की गरमी का असर है मन में

सिराज औरंगाबादी

दिन-ब-दिन अब लुत्फ़ तेरा हम पे कम होने लगा

सिराज औरंगाबादी

दिल में जब आ के इश्क़ ने तेरे महल किया

सिराज औरंगाबादी

अश्क-ए-ख़ूनीं है शफ़क़ आज मिरी आँखों में

सिराज औरंगाबादी

तिरे आते ही सब दुनिया जवाँ मालूम होती है

सिकंदर अली वज्द

महीने के अख़ीर दिनों में

सिदरा सहर इमरान

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