दिन Poetry (page 19)

जागते दिन की गली में रात आँखें मल रही है

सिदरा सहर इमरान

असबाब-ए-हस्त रह में लुटाना पड़ा मुझे

सिदरा सहर इमरान

मिरे चेहरे से ग़म आँखों से हैरानी न जाएगी

सिद्दीक़ मुजीबी

दिल-ए-आईना-सामाँ पारा पारा कर के देखा जाए

सिद्दीक़ मुजीबी

भूली-बिसरी बात है लेकिन अब तक भूल न पाए हम

सिद्दीक़ मुजीबी

अजीब धुँद है आँखों को सूझता भी नहीं

सिद्दीक़ मुजीबी

न देखा जामा-ए-ख़ुद-रफ़्तगी उतार के भी

सिद्दीक़ शाहिद

कार-ए-मुश्किल ही किया दुनिया में गर मैं ने किया

सिद्दीक़ शाहिद

ख़ुदाया हिन्द पर तेरी इनायत हो इनायत हो

श्याम सुंदर लाल बर्क़

सातों आलम सर करने के बा'द इक दिन की छुट्टी ले कर

शुजा ख़ावर

तकल्लुफ़ छोड़ कर मेरे बराबर बैठ जाएगा

शुजा ख़ावर

लोगों ने हम को शहर का क़ाज़ी बना दिया

शुजा ख़ावर

जो तुम से पहले आए थे उन की कारिस्तानी देखो

शुजा ख़ावर

इस तरह पहुँचेगा कैसे पाया-ए-तकमील को

शुजा ख़ावर

चेहरे पे थोड़ी रक्खी है

शुजा ख़ावर

चलो ये तो हादसा हो गया कि वो साएबान नहीं रहा

शुजा ख़ावर

अब के बरस हूँ जितना तन्हा

शोज़ेब काशिर

तेरी उल्फ़त में न जाने क्या से क्या हो जाऊँगा

शोला हस्पानवी

राज़-ए-फ़ितरत निहाँ था निहाँ है अभी

शोला हस्पानवी

ईद को भी वो नहीं मिलते हैं मुझ से न मिलें

शोला अलीगढ़ी

दिल की इक हर्फ़-ओ-हिकायात है ये भी न सही

शोला अलीगढ़ी

वहम साबित हुए सब ख़्वाब सुहाने तेरे

शोहरत बुख़ारी

इक उम्र फ़साने ग़म-ए-जानाँ के गढ़े हैं

शोहरत बुख़ारी

अपनों से मुरव्वत का तक़ाज़ा नहीं करते

शोहरत बुख़ारी

ऐश-ए-दुनिया का जब शुमार न था

शोहरत बुख़ारी

आ दिल में तुझे कहीं छुपा लूँ

शोहरत बुख़ारी

आ दिल में तुझे कहीं छुपा लूँ

शोहरत बुख़ारी

ये कह कह के हम दिल को बहला रहे हैं

शोभा कुक्कल

काटे हैं दिन हयात के लाचार की तरह

शोभा कुक्कल

कभी वो रंज के साँचे में ढाल देता है

शोभा कुक्कल

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