दिन Poetry (page 21)

एक दिन न रोने का फ़ैसला किया मैं ने

शहपर रसूल

चुप गुज़र जाता हूँ हैरान भी हो जाता हूँ

शहपर रसूल

तंग थी जा ख़ातिर-ए-नाशाद में

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

कौन से दिन तिरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

है बद बला किसी को ग़म-ए-जावेदाँ न हो

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

गह हम से ख़फ़ा वो हैं गहे उन से ख़फ़ा हम

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दिल लिया जिस ने बेवफ़ाई की

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दिल का गिला फ़लक की शिकायत यहाँ नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

असर-ए-आह-ए-दिल-ए-ज़ार की अफ़्वाहें हैं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

अजीब आदत है बे-सबब इंतिज़ार करना

शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी

गिरता हुआ दरख़्त

शीरीं अहमद

दावत-नामा

शीरीं अहमद

बरसों से घूमता है इसी तरह रात दिन

शीन काफ़ निज़ाम

आरज़ू थी एक दिन तुझ से मिलूँ

शीन काफ़ निज़ाम

क्या ख़बर थी आतिशीं आब-ओ-हवा हो जाऊँगा

शीन काफ़ निज़ाम

इक साएँ साएँ घेरे है गिरते मकान को

शीन काफ़ निज़ाम

आरज़ू थी एक दिन तुझ से मिलूँ

शीन काफ़ निज़ाम

हम-ज़ाद

शाज़ तमकनत

सँभला नहीं दिल तुझ से बिछड़ कर कई दिन तक

शाज़ तमकनत

न महफ़िल ऐसी होती है न ख़ल्वत ऐसी होती है

शाज़ तमकनत

जिस तरफ़ जाऊँ उधर आलम-ए-तन्हाई है

शाज़ तमकनत

जिन ज़ख़्मों पर था नाज़ हमें वो ज़ख़्म भी भरते जाते हैं

शाज़ तमकनत

हयात रास न आए अजल बहाना करे

शाज़ तमकनत

दिल-शिकस्ता हुए टूटा हुआ पैमान बने

शाज़ तमकनत

छोड़ दूँ शहर तिरा छोड़ दूँ दुनिया तेरी

शाज़ तमकनत

वक़्त आख़िर ले गया वो शोख़ियाँ वो बाँकपन

शायान क़ुरैशी

सब्र-ओ-क़रार टूट गया इज़्तिराब से

शायान क़ुरैशी

था बंद वो दर फिर भी मैं सौ बार गया था

शौक़ क़िदवाई

दिल खोटा है हम को उस से राज़-ए-इश्क़ न कहना था

शौक़ क़िदवाई

शब-हाए-ऐश का वो ज़माना किधर गया

शौक़ देहलवी मक्की

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