दिन Poetry (page 22)

ये ख़बर आई है आज इक मुर्शिद-ए-अकमल के पास

शौक़ बहराइची

शैख़ ओ बरहमन दोनों हैं बर-हक़ दोनों का हर काम मुनासिब

शौक़ बहराइची

किया जो ए'तिबार उन पर मरीज़-ए-शाम-ए-हिज्राँ ने

शौक़ बहराइची

ख़िलाफ़-ए-हंगामा-ए-तशद्दुद क़दम जो हम ने बढ़ा दिए हैं

शौक़ बहराइची

ईमान की लग़्ज़िश का इम्कान अरे तौबा

शौक़ बहराइची

इधर है बाद-ए-सुमूम नालाँ उधर है बर्क़-ए-तपाँ भी आजिज़

शौक़ बहराइची

देखते हैं जब कभी ईमान में नुक़सान शैख़

शौक़ बहराइची

याद

शौकत परदेसी

उस के नाम

शौकत परदेसी

ज़िंदगी का सफ़र ख़त्म होता रहा तुम मुझे दम-ब-दम याद आते रहे

शौकत परदेसी

हसरतें बन कर निगाहों से बरस जाएँगे हम

शौकत परदेसी

मौत का फ़रिश्ता

शौकत आबिदी

काट कर जो राह का बूढ़ा शजर ले जाएगा

शर्मा तासीर

सारी दुनिया से लड़े जिस के लिए

शारिक़ कैफ़ी

एक दिन हम अचानक बड़े हो गए

शारिक़ कैफ़ी

अभी तो अच्छी लगेगी कुछ दिन जुदाई की रुत

शारिक़ कैफ़ी

किसी ताँगे में फिर सामान रक्खा जा रहा है

शारिक़ कैफ़ी

जन्नत से दूर

शारिक़ कैफ़ी

जनाज़े में तो आओगे न मेरे

शारिक़ कैफ़ी

छुट्टी का दिन

शारिक़ कैफ़ी

बात फाँसी के दिन की नहीं

शारिक़ कैफ़ी

ये कुछ बदलाव सा अच्छा लगा है

शारिक़ कैफ़ी

वो दिन भी थे कि इन आँखों में इतनी हैरत थी

शारिक़ कैफ़ी

उदास हैं सब पता नहीं घर में क्या हुआ है

शारिक़ कैफ़ी

तन से जब तक साँस का रिश्ता रहेगा

शारिक़ कैफ़ी

सब आसान हुआ जाता है

शारिक़ कैफ़ी

ख़मोशी बस ख़मोशी थी इजाज़त अब हुई है

शारिक़ कैफ़ी

कहाँ सोचा था मैं ने बज़्म-आराई से पहले

शारिक़ कैफ़ी

झूट पर उस के भरोसा कर लिया

शारिक़ कैफ़ी

एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए

शारिक़ कैफ़ी

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