शोक Poetry (page 112)

बारिशों में अब के याद आए बहुत

बकुल देव

ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

ज़फ़र

ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

ज़फ़र

वो सौ सौ अठखटों से घर से बाहर दो क़दम निकले

ज़फ़र

वाक़िफ़ हैं हम कि हज़रत-ए-ग़म ऐसे शख़्स हैं

ज़फ़र

टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच

ज़फ़र

तुफ़्ता-जानों का इलाज ऐ अहल-ए-दानिश और है

ज़फ़र

न दाइम ग़म है ने इशरत कभी यूँ है कभी वूँ है

ज़फ़र

मोहब्बत चाहिए बाहम हमें भी हो तुम्हें भी हो

ज़फ़र

मर गए ऐ वाह उन की नाज़-बरदारी में हम

ज़फ़र

क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते

ज़फ़र

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

इतना न अपने जामे से बाहर निकल के चल

ज़फ़र

हम ये तो नहीं कहते कि ग़म कह नहीं सकते

ज़फ़र

होते होते चश्म से आज अश्क-बारी रह गई

ज़फ़र

गालियाँ तनख़्वाह ठहरी है अगर बट जाएगी

ज़फ़र

गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है

ज़फ़र

भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ

ज़फ़र

ज़रूरतों की हमाहमी में जो राह चलते भी टोकती है वो शाइ'री है

बद्र-ए-आलम ख़लिश

गौरय्यों ने जश्न मनाया मेरे आँगन बारिश का

बद्र-ए-आलम ख़लिश

नवेद-ए-सफ़र

बद्र वास्ती

तुम्हारे दिल में जो ग़म बसा है तो मैं कहाँ हूँ

बद्र वास्ती

महसूस हो रहा है जो ग़म मेरी ज़ात का

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

हम ने आप के ग़म को हम-सफ़र बनाया है

बदर जमाली

दास्तान-ए-ग़म तुझे बतलाएँ क्या

बाबर रहमान शाह

फिर किसी शख़्स की याद आई है

बीएस जैन जौहर

नग़्मे तड़प रहे हैं दिल-ए-बे-क़रार में

बीएस जैन जौहर

जाने फिर तुम से मुलाक़ात कभी हो कि न हो

बीएस जैन जौहर

जाने फिर तुम से मुलाक़ात कभी हो कि न हो

बीएस जैन जौहर

इक हूक सी जब दिल में उट्ठी जज़्बात हमारे आ पहुँचे

बीएस जैन जौहर

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