शोक Poetry (page 111)

शोर-ए-दरिया है कहानी मेरी

बाक़र नक़वी

ये रात

बाक़र मेहदी

उस ने कहा!

बाक़र मेहदी

लहरों का आतिश-फ़िशाँ

बाक़र मेहदी

जहन्नम

बाक़र मेहदी

बहुत है एक नज़र

बाक़र मेहदी

तबाह हो के भी इक अपनी आन बाक़ी है

बाक़र मेहदी

लरज़ लरज़ के न टूटें तो वो सितारे क्या

बाक़र मेहदी

किसी पे कोई भरोसा करे तो कैसे करे

बाक़र मेहदी

इस दर्जा हुआ ख़ुश कि डरा दिल से बहुत मैं

बाक़र मेहदी

फ़रेब खा के भी शर्मिंदा-ए-सुकूँ न हुए

बाक़र मेहदी

दुश्मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं

बाक़र मेहदी

चाहा बहुत कि इश्क़ की फिर इब्तिदा न हो

बाक़र मेहदी

बुझी बुझी है सदा-ए-नग़्मा कहीं कहीं हैं रबाब रौशन

बाक़र मेहदी

बरसों पढ़ कर सरकश रह कर ज़ख़्मी हो कर समझा मैं

बाक़र मेहदी

बहुत ज़ी-फ़हम हैं दुनिया को लेकिन कम समझते हैं!

बाक़र मेहदी

अजीब दिल में मिरे आज इज़्तिराब सा है!

बाक़र मेहदी

अब ख़ानुमाँ-ख़राब की मंज़िल यहाँ नहीं

बाक़र मेहदी

सब्र-ओ-ज़ब्त की जानाँ दास्ताँ तो मैं भी हूँ दास्ताँ तो तुम भी हो

बक़ा बलूच

कम कम रहना ग़म के सुर्ख़ जज़ीरों में

बक़ा बलूच

बीसवीं सदी के हम शाइ'र-ए-परेशाँ हैं

बनो ताहिरा सईद

एक पुर-असरार सदा

बलराज कोमल

बारिशों में ग़ुस्ल करते सब्ज़ पेड़

बलराज कोमल

और कुछ देर ग़म नज़र में रख

बकुल देव

तिरा लहज़ा वही तलवार जैसा था

बकुल देव

मिरे कुछ भी कहे को काटता है

बकुल देव

जो है चश्मा उसे सराब करो

बकुल देव

जान ले ले न ज़ब्त-ए-आह कहीं

बकुल देव

हुए हम बे-सर-ओ-सामान लेकिन

बकुल देव

हमें रास आनी है राहों की गठरी

बकुल देव

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