शोक Poetry (page 109)

हक़ पसंदों से जहाँ बर-सर-ए-पैकार सही

बेबाक भोजपुरी

फ़स्ल-ए-बहार जाने ये क्या गुल कतर गई

बेबाक भोजपुरी

बख़्त क्या जाने भला या कि बुरा होता है

बेबाक भोजपुरी

बड़ी दिल-शिकन है रह-ए-सफ़र कोई हम-सफ़र है न यार है

बेबाक भोजपुरी

झोंके आते हैं बू-ए-उल्फ़त के

बयान यज़दानी

मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर न इतना उछल के चल

बयान मेरठी

ख़ाक करती है ब-रंग-ए-चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम रक़्स

बयान मेरठी

ग़म्ज़ा-ए-मा'शूक़ मुश्ताक़ों को दिखलाती है तेग़

बयान मेरठी

ऐ जुनूँ हाथ के चलते ही मचल जाऊँगा

बयान मेरठी

पूछता कौन है डरता है तू ऐ यार अबस

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

मैं तिरे डर से रो नहीं सकता

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

ले के दिल उस शोख़ ने इक दाग़ सीने पर दिया

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

ज़ब्त-ए-ग़म कर भी लिया तो क्या किया

बासित भोपाली

सब काएनात-ए-हुस्न का हासिल लिए हुए

बासित भोपाली

नहीं ये जल्वा-हा-ए-राज़-ए-इरफ़ाँ देखने वाले

बासित भोपाली

कोई मेयार-ए-मोहब्बत न रहा मेरे बा'द

बासित भोपाली

किसी के नक़्श-ए-क़दम का निशाँ नहीं मिलता

बासित भोपाली

इश्क़-ए-सितम-परस्त क्या हुस्न-ए-सितम-शिआ'र क्या

बासित भोपाली

हयात-ओ-मौत का इक सिलसिला है

बासित भोपाली

जिन दिनों ग़म ज़ियादा होता है

बासिर सुल्तान काज़मी

ज़ोर से साँस जो लेता हूँ तो अक्सर शब-ए-ग़म

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

वो अपने मतलब की कह रहे हैं ज़बान पर गो है बात मेरी

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

कौन कहता है नसीम-ए-सहरी आती है

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

चराग़ उस ने बुझा भी दिया जला भी दिया

बशीरुद्दीन अहमद देहलवी

ख़ुद अपना ए'तिबार गँवाता रहा हूँ मैं

बशीर सैफ़ी

तज़्किरे में तिरे इक नाम को यूँ जोड़ दिया

बशीर फ़ारूक़ी

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

मिरे साथ चलने वाले तुझे क्या मिला सफ़र में

बशीर बद्र

ये चराग़ बे-नज़र है ये सितारा बे-ज़बाँ है

बशीर बद्र

वो सूरत गर्द-ए-ग़म में छुप गई हो

बशीर बद्र

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