शोक Poetry (page 108)

मुस्तक़िल रोने से दिल की बे-कली बढ़ जाएगी

भारत भूषण पन्त

दीद की तमन्ना में आँख भर के रोए थे

भारत भूषण पन्त

न मिला तिरा पता तो मुझे लोग क्या कहेंगे

बेताब लखनवी

सुन के सारी दास्तान-ए-रंज-ओ-ग़म

बेख़ुद देहलवी

लड़ाएँ आँख वो तिरछी नज़र का वार रहने दें

बेख़ुद देहलवी

हुआ जो वक़्फ़-ए-ग़म वो दिल किसी का हो नहीं सकता

बेख़ुद देहलवी

हज़रत-ए-दिल ये इश्क़ है दर्द से कसमसाए क्यूँ

बेख़ुद देहलवी

दिल चुरा ले गई दुज़्दीदा-नज़र देख लिया

बेख़ुद देहलवी

क्यूँ मिरा हाल क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

बेखुद बदायुनी

नज़र की फ़त्ह कभी क़ल्ब की शिकस्त लगे

बेकल उत्साही

नए ज़माने में अब ये कमाल होने लगा

बेकल उत्साही

ज़िंदा हूँ इस तरह कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं

बहज़ाद लखनवी

यूँ तो जो चाहे यहाँ साहब-ए-महफ़िल हो जाए

बहज़ाद लखनवी

उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं

बहज़ाद लखनवी

मसरूर भी हूँ ख़ुश भी हूँ लेकिन ख़ुशी नहीं

बहज़ाद लखनवी

ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ

बहज़ाद लखनवी

है ख़िरद-मंदी यही बा-होश दीवाना रहे

बहज़ाद लखनवी

इक बे-वफ़ा को प्यार किया हाए क्या किया

बहज़ाद लखनवी

इक बेवफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया

बहज़ाद लखनवी

ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए

बहज़ाद लखनवी

बरसों ग़म-ए-गेसू में गिरफ़्तार तो रक्खा

बेगम लखनवी

तुम ख़फ़ा हो तो अच्छा ख़फ़ा हो

बेदम शाह वारसी

सीने में दिल है दिल में दाग़ दाग़ में सोज़-ओ-साज़-ए-इश्क़

बेदम शाह वारसी

पहले शर्मा के मार डाला

बेदम शाह वारसी

न तो अपने घर में क़रार है न तिरी गली में क़याम है

बेदम शाह वारसी

न कुनिश्त ओ कलीसा से काम हमें दर-ए-दैर न बैत-ए-हरम से ग़रज़

बेदम शाह वारसी

कभी यहाँ लिए हुए कभी वहाँ लिए हुए

बेदम शाह वारसी

दारू-ए-दर्द-ए-निहाँ राहत-ए-जानी सनमा

बेदम शाह वारसी

बरहमन मुझ को बनाना न मुसलमाँ करना

बेदम शाह वारसी

अहसन तक़्वीम

बेबाक भोजपुरी

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