शोक Poetry (page 110)

पिछली रात की नर्म चाँदनी शबनम की ख़ुनकी से रचा है

बशीर बद्र

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई

बशीर बद्र

मेरे दिल की राख कुरेद मत इसे मुस्कुरा के हवा न दे

बशीर बद्र

कोई लश्कर कि धड़कते हुए ग़म आते हैं

बशीर बद्र

जल्वों का उन के दिल को तलब-गार कर दिया

बशीरुद्दीन राज़

हुई मुद्दतें ऐ दिल-ए-हज़ीं न पयाम है न सलाम है

बशीरुद्दीन राज़

दिल जो उम्मीद-वार होता है

बशीरुद्दीन राज़

हर गाम पे आवारगी-ओ-दर-ब-दरी में

बशीर अहमद बशीर

इक बे-सबात अक्स बना बे-निशाँ गया

बशीर अहमद बशीर

अज़ल-ता-अबद

बशर नवाज़

जब कभी होंगे तो हम माइल-ए-ग़म ही होंगे

बशर नवाज़

छेड़ा ज़रा सबा ने तो गुलनार हो गए

बशर नवाज़

ब-हर-उनवाँ मोहब्बत को बहार-ए-ज़िंदगी कहिए

बशर नवाज़

अक्स हर रोज़ किसी ग़म का पड़ा करता है

बशर नवाज़

पर्दा उलट के उस ने जो चेहरा दिखा दिया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

चाँद सा चेहरा जो उस का आश्कारा हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

दिन-रात पड़ा रहता हूँ दरवाज़े पे अपने

बर्क़ देहलवी

तेरे ग़म से तो सुकून मिलता है

बाक़ी सिद्दीक़ी

उन का या अपना तमाशा देखो

बाक़ी सिद्दीक़ी

सुब्ह का भेद मिला क्या हम को

बाक़ी सिद्दीक़ी

एतिबार-ए-नज़र करें कैसे

बाक़ी सिद्दीक़ी

आस्तीं में साँप इक पलता रहा

बाक़ी सिद्दीक़ी

सिपाह-ए-इशरत पे फ़ौज-ए-ग़म ने जो मिल के मरकब बहम उठाए

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

सीखा जो क़लम से न-ए-ख़ाली का बजाना

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

मुझे तो इश्क़ में अब ऐश-ओ-ग़म बराबर है

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

दिल ख़ूँ है ग़म से और जिगर यक-न-शुद दो-शुद

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

दिल ख़ूँ है ग़म से और जिगर यक न-शुद दो शुद

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

आवे जो नाज़ से मिरा वो बुत-ए-सीम-बर ब-बर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

आवे जो नाज़ से मिरा वो बुत-ए-सीम-बर ब-बर

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

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